सुंदर पोपो एक बार फिर चर्चा में हैं। दशकों पुरानी भोजपुरी लोकगीत ‘फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी’ इन दिनों फिर सुर्खियों में है। हाल ही में इस गीत का इस्तेमाल फिल्म ‘धमाल 4’ में किए जाने के बाद इसकी लोकप्रियता एक बार फिर बढ़ गई है। वर्ष 1969 में त्रिनिदाद के प्रसिद्ध गायक सुंदर पोपो ने इस लोकगीत को आधुनिक अंदाज में प्रस्तुत किया था, जिसके बाद यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुआ और भोजपुरी संगीत को वैश्विक पहचान मिली। Bhojpuri24.com के ‘भोजपुरी धुरंधर’ श्रृंखला में आज विस्तार से जानते हैं चटनी संगीत के इस महान उस्ताद और भोजपुरी संगीत के वैश्विक दूत सुंदर पोपो के बारे में।

भोजपुरी संगीत का इतिहास केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं है। यह उन करोड़ों प्रवासी भारतीयों की कहानी भी है, जिन्होंने अपनी भाषा, संस्कृति और लोकधुनों को दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जीवित रखा। ऐसे ही सांस्कृतिक योद्धाओं में सबसे प्रमुख नाम है सुंदर पोपो का। उन्हें आज चटनी संगीत का जनक माना जाता है। उन्होंने भोजपुरी लोकधुनों को कैरेबियाई संगीत के साथ जोड़कर एक नई पहचान दी और दुनिया को बताया कि भोजपुरी संस्कृति कितनी जीवंत और वैश्विक है।
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भारतीय विरासत से जुड़ा कैरेबियाई बेटा
4 नवंबर 1943 को त्रिनिदाद एवं टोबैगो के बैरकपुर क्षेत्र के मंकी टाउन में जन्मे सुंदर पोपो का वास्तविक नाम सुन्नीलाल पोपो बहोरा था। उनके पूर्वज भारत से गिरमिटिया मजदूरों के रूप में कैरेबियन पहुंचे थे। भले ही उनका जन्म भारत से हजारों किलोमीटर दूर हुआ, लेकिन उनके घर में भोजपुरी भाषा, भारतीय रीति-रिवाज और लोकगीतों का वातावरण बना हुआ था। उनकी मां भोजपुरी लोकगीतों की अच्छी जानकार थीं, जबकि उनके पिता तासा और ड्रम बजाने में निपुण थे। यही पारिवारिक माहौल सुंदर पोपो के भीतर संगीत के प्रति गहरा लगाव पैदा करने वाला बना।
बचपन से संगीत बना जीवन का हिस्सा
सुंदर पोपो ने बहुत कम उम्र में गायन शुरू कर दिया था। किशोरावस्था में ही वे चर्चों, सामाजिक आयोजनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में गीत गाने लगे थे। उनकी आवाज में ऐसी मिठास थी कि लोग उन्हें बार-बार सुनना चाहते थे।
धीरे-धीरे विवाह समारोहों और स्थानीय आयोजनों में उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी। उस समय वे मुख्य रूप से ऑर्केस्ट्रा गायक के रूप में पहचाने जाते थे। संगीत उनके लिए केवल शौक नहीं था, बल्कि जीवन का उद्देश्य बन चुका था।
चौकीदार की नौकरी से संगीत के शिखर तक
सफलता का रास्ता आसान नहीं था। शुरुआती दिनों में सुंदर पोपो ने एक फैक्ट्री में चौकीदार की नौकरी की। आर्थिक जिम्मेदारियों के बीच भी उन्होंने संगीत का साथ नहीं छोड़ा। दिन में नौकरी और खाली समय में संगीत साधना उनकी दिनचर्या का हिस्सा थी।

इसी दौरान उन्होंने प्रसिद्ध संगीतकार जेम्स रामसवाक से संगीत की शिक्षा प्राप्त की। यह प्रशिक्षण उनके करियर के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ। इससे उनकी गायकी में तकनीकी परिपक्वता आई और वे पेशेवर कलाकार के रूप में विकसित हुए।
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एक मुलाकात जिसने बदल दी किस्मत
वर्ष 1969 सुंदर पोपो के जीवन में निर्णायक साबित हुआ। इसी साल उनकी मुलाकात रेडियो कर्मी मोइन मोहम्मद से हुई। यह मुलाकात उनके संगीत सफर का टर्निंग प्वाइंट बन गई। इसी दौर में उनका गीत ‘नाना एंड नानी’ रिकॉर्ड हुआ, जिसने पूरे त्रिनिदाद एवं टोबैगो और कैरेबियाई क्षेत्र में धूम मचा दी। इस गीत की सफलता ने सुंदर पोपो को स्थानीय कलाकार से अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाले गायक में बदल दिया। इसके बाद उनके कई एल्बम आए और उनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई।
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चटनी म्यूजिक का जन्म और वैश्विक पहचान
सुंदर पोपो की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल गीत गाना नहीं थी, बल्कि एक नई संगीत शैली का निर्माण करना था। उन्होंने भारतीय भोजपुरी लोकधुनों को कैरेबियाई ताल, कैलिप्सो और स्थानीय संगीत के साथ मिलाकर एक नया प्रयोग किया, जिसे बाद में ‘चटनी म्यूजिक’ के नाम से जाना गया।
उनके गीत ‘फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी’, ‘सास मोरा लागे’, ‘स्कॉर्पियन’, ‘ओह माय लवर’ और ‘नाना एंड नानी’ चटनी संगीत की पहचान बन गए। खासकर ‘फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी’ ने उन्हें अमर कर दिया। यह गीत आज भी भारत, त्रिनिदाद, सूरीनाम, गुयाना, फिजी और मॉरीशस के भोजपुरी समाज में समान रूप से लोकप्रिय है।
अपने बैंड के साथ उन्होंने अमेरिका, कनाडा, यूरोप और कैरेबियाई देशों में अनेक कार्यक्रम किए। उनकी प्रस्तुतियां केवल संगीत कार्यक्रम नहीं, बल्कि भोजपुरी संस्कृति के उत्सव बन जाती थीं।
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महानायक अमिताभ बच्चन समेत बॉलीवुड भी करता था फॉलो
रिपोर्टों के अनुसार, बॉलीवुड महानायक अमिताभ बच्चन ने 1980 के दशक में अपने लाइव कार्यक्रमों में सुंदर पोपो के लोकप्रिय गीत ‘चादर बिछावो बलमा’ को शामिल किया था। स्वयं सुंदर पोपो ने एक पुराने साक्षात्कार में कहा था कि कई चटनी गायक और यहां तक कि भारतीय फिल्मों में भी उनकी धुनों का उपयोग किया जाता रहा है।
सुंदर पोपो का रिश्ता केवल प्रेरणा तक सीमित नहीं था। उन्होंने भजन गायक अनुप जलोटा के साथ एक एल्बम रिकॉर्ड किया और किशोर कुमार जैसे महान कलाकारों के साथ भी मंच साझा किया। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने न्यूयॉर्क के प्रतिष्ठित मैडिसन स्क्वायर गार्डन में भी प्रस्तुति दी।
पोपो ने अपने जीवन में 15 से अधिक एल्बम और 165 से ज्यादा गीत रिकॉर्ड किए। उन्होंने साबित किया कि भोजपुरी केवल एक क्षेत्रीय भाषा नहीं, बल्कि दुनिया भर में फैले करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक पहचान है। आज जब ‘फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी’ एक बार फिर चर्चा में है, तब सुंदर पोपो का योगदान नई पीढ़ी के सामने और अधिक मजबूती से उभरकर आ रहा है।

विरासत जो आज भी दुनिया को जोड़ रही है
सुंदर पोपो एक महान कलाकार होने के साथ-साथ बेहद सरल और विनम्र इंसान भी थे। अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिलने के बावजूद वे अपनी जड़ों से जु ड़े रहे। उनके लिए संगीत प्रसिद्धि कमाने का माध्यम नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाने का मिशन था। 1 अप्रैल 2000 को उन्होंने अपना अंतिम गीत रिकॉर्ड किया। इसके ठीक एक महीने बाद, 2 मई 2000 को उनका निधन हो गया। लेकिन उनकी आवाज और उनका संगीत आज भी जीवित है।
दुर्भाग्य से भारत में आज भी बहुत से लोग सुंदर पोपो के योगदान से परिचित नहीं हैं। जबकि सच्चाई यह है कि उन्होंने भोजपुरी भाषा को वैश्विक पहचान दिलाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उन्होंने साबित किया कि भोजपुरी केवल एक क्षेत्रीय भाषा नहीं, बल्कि विश्वभर में फैले करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक पहचान है।


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