भारतीयों की वह विश्वगाथा जिसने गुलामी को संस्कृति की ताकत में बदल दिया, जहाजों से शुरू हुआ सफर, जिसने मॉरीशस से कैरेबियन तक भारतीयता और भोजपुरी की नई पहचान बनाई
नई दिल्ली: 14 मई को दुनिया भर में गिरमिटिया दिवस मनाया जाता है। यह दिन केवल प्रवासी भारतीयों को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक अध्याय को समझने का दिन है जिसने भारतीय समाज, खासकर भोजपुरी भाषी समुदाय को वैश्विक पहचान दिलाई। गिरमिटिया शब्द अंग्रेजी के Agreement से बना है। 19वीं सदी में अंग्रेज मजदूरों से एक अनुबंध (Agreement) पर हस्ताक्षर करवाते थे, जिसे ग्रामीण लोग गिरमिट बोलने लगे और धीरे-धीरे ये मजदूर गिरमिटिया कहलाए।
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1834 से लेकर लगभग 1917 तक लाखों भारतीयों को ब्रिटिश, फ्रांसीसी और डच उपनिवेशों में गन्ने के खेतों, खदानों और बागानों में काम करने के लिए भेजा गया। इनमें सबसे बड़ी संख्या बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और वर्तमान झारखंड के भोजपुरी-अवधी भाषी इलाकों से थी। अलग-अलग इतिहासकारों के अनुसार लगभग 15 लाख भारतीय गिरमिटिया मजदूरों के रूप में दुनिया के विभिन्न देशों में भेजे गए थे। इनमें से बड़ी आबादी मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद एंड टोबैगो और दक्षिण अफ्रीका में बस गई।
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गिरमिटिया डे का ऐतिहासिक महत्व
14 मई 1879 को फिजी के तट पर पहला गिरमिटिया जहाज लियोनिडास पहुंचा था। इस दिन को फिजी में राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया गया है। गिरमिटिया डे सिर्फ एक याद नहीं, बल्कि उस कालखंड की याद है जब दास प्रथा खत्म होने के बाद ब्रिटिश उपनिवेशों में सस्ते मजदूरों की भारी मांग पैदा हुई। 1834 से 1917 तक चले इस indentured labour system के तहत करीब 1.5 मिलियन भारतीय भेजे गए। इनमें सबसे ज्यादा संख्या बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश (भोजपुर, बलिया, गोरखपुर, आजमगढ़, देवरिया) और कुछ बंगाल-मद्रास क्षेत्र से थी।
न्यूजीलैंड निवासी लेखक और गिरमिटिया मजदूरों के वंशज राजेंद्र प्रसाद ने अपनी पुस्तक ‘टियर्स इन पैराडाइज: सफरिंग एंड स्ट्रगल्स ऑफ इंडियंस इन फिजी 1879-2004’ में फिजी के गिरमिटिया भारतीयों के इतिहास, संघर्ष और पीड़ा को विस्तार से दर्ज किया है। उन्होंने “एन्स्लेव्ड इन पैराडाइज” पुस्तक भी लिखी तथा ‘गिरमिट – द फील्ड्स ऑफ सैडनेस’ नामक एक चर्चित डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया, जो गिरमिटिया मजदूरों के दर्द और जीवन संघर्ष को सामने लाती है।

गुलामी खत्म हुई तो शुरू हुई नई गुलामी
ब्रिटिश साम्राज्य ने 1833 में आधिकारिक रूप से दास प्रथा (Slavery) समाप्त कर दी। लेकिन कैरेबियन और अफ्रीकी उपनिवेशों में गन्ना उत्पादन और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पूरी तरह मजदूरों पर निर्भर थी।
गुलामों की कमी होने लगी तो अंग्रेजों ने भारत और चीन से सस्ते श्रमिक ले जाने की योजना बनाई। भारत उनके लिए सबसे बड़ा स्रोत बना, क्योंकि यहां गरीबी, अकाल, अशिक्षा और बेरोजगारी बहुत अधिक थी।
भर्ती एजेंट, जिन्हें आरकाटी कहा जाता था, गांव-गांव जाकर लोगों को सुनहरे सपने दिखाते थे। कहा जाता था कि वहां सोना मिलता है, पांच साल में अमीर बन जाओगे, जमीन मिलेगी, मुफ्त यात्रा और अच्छा खाना मिलेगा लेकिन वास्तविकता बिल्कुल अलग थी।
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जब हमारे पुरखे भारत से जहाजों में बैठाकर फिजी ले जाए गए, तब उनके पास न धन था, न शक्ति। उनके पास केवल मिट्टी की याद, भोजपुरी की बोली और रामचरितमानस के कुछ पन्ने थे। उन्हीं यादों और शब्दों ने उन्हें टूटने नहीं दिया। गिरमिटिया इतिहास दर्द का इतिहास जरूर है, लेकिन यह मानव आत्मा की सबसे बड़ी जीत की कहानी भी है। –राजेंद्र प्रसाद, लेखक एवं गिरमिटिया वंशज

कलकत्ता और मद्रास डिपो जहां से शुरू होता था दर्द
गिरमिटिया मजदूरों को पहले कलकत्ता (अब कोलकाता) और मद्रास के डिपो में लाया जाता था। वहां मेडिकल जांच और अनुबंध की औपचारिकताएं पूरी होती थीं। कोलकाता का आप्रवासी घाट (Aapravasi Ghat) आज यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है। यहीं से हजारों भारतीय मजदूर जहाजों में बैठाकर मॉरीशस भेजे गए थे।
कई लोगों को यह तक नहीं पता होता था कि उन्हें किस देश ले जाया जा रहा है। ग्रामीण समाज में समुद्र पार करना कालापानी माना जाता था, इसलिए एक बार जहाज पर चढ़ना सामाजिक बहिष्कार जैसा था।
जहाजों का सफर, बीमारी, भूख और मौत-आत्महत्याएं
गिरमिटिया मजदूरों के लिए समुद्री यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने का साधन नहीं थी, बल्कि वह दर्द, भय और अनिश्चितता से भरी त्रासदी थी। भारत से मॉरीशस पहुंचने में लगभग 45 से 90 दिन लगते थे, जबकि फिजी, गुयाना या त्रिनिदाद जैसे कैरेबियन देशों तक का सफर कई महीनों तक चलता था।
जहाजों में मजदूरों को बेहद तंग और अस्वच्छ परिस्थितियों में रखा जाता था। सैकड़ों लोगों को छोटे-छोटे हिस्सों में भर दिया जाता था, जहां न पर्याप्त हवा होती थी और न ही साफ पानी। भोजन सीमित और निम्न गुणवत्ता का होता था, जिससे कुपोषण और बीमारी तेजी से फैलती थी। हैजा, बुखार और संक्रमण जैसी बीमारियां आम थीं, लेकिन चिकित्सा सुविधाएं लगभग न के बराबर थीं।
महिलाओं को यात्रा के दौरान शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ता था। कई मजदूर अपने परिवारों से बिछड़ने के दुख और भविष्य की अनिश्चितता से टूट जाते थे। इतिहास में ऐसे कई उल्लेख मिलते हैं, जहां जहाजों पर मौत, बीमारी और आत्महत्या की घटनाएं हुईं। यह समुद्री सफर दरअसल गिरमिटिया जीवन की पहली बड़ी पीड़ा था।
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सात समुंदर पार करइबs हो राम…
गिरमिटिया मजदूरों की पीड़ा केवल इतिहास की किताबों में नहीं, बल्कि उनके लोकगीतों में भी जीवित है। समुद्री यात्रा के दौरान घर-परिवार से बिछड़ने का दर्द, अनिश्चित भविष्य का भय और कालापानी पार करने की सामाजिक त्रासदी भोजपुरी गीतों में गहराई से दिखाई देती है। बचे लोग “जेहाजी भाई-बहन” बनकर एक-दूसरे का साथ देते। पूर्वांचल के बिदेसिया गीत इसी दर्द को आज भी गाते हैं- ‘काहे बिदेसवा जइबे रे… भारत के देशवा…- ‘सात समुंदर पार करइबs हो राम…’ इन गीतों में बिछोह, आशा और पीड़ा का मिश्रण है।
विदेश पहुंचने के बाद उनका जीवन और भी कठिन हो जाता था। मॉरीशस, गुयाना और त्रिनिदाद के शुगर प्लांटेशन में मजदूरों से 12 से 16 घंटे तक कठोर श्रम कराया जाता था। मामूली गलती या काम में कमी होने पर उन्हें कोड़े मारना, मजदूरी काटना या दंड देना आम बात थी। पांच साल के अनुबंध के बावजूद कई मजदूर लंबे समय तक शोषण का शिकार बने रहे।
महिलाओं की स्थिति सबसे अधिक दयनीय थी। उन्हें खेतों में कठिन श्रम के साथ सामाजिक और लैंगिक उत्पीड़न भी सहना पड़ता था। प्रसिद्ध इतिहासकार ह्यू टिंकर ने इसलिए गिरमिट प्रथा को ‘A New System of Slavery’ यानी ‘गुलामी की नई व्यवस्था’ कहा था।

संस्कृति बनी सबसे बड़ा सहारा
गिरमिटिया मजदूर जब अपने गांव, परिवार और मिट्टी से दूर अनजान देशों में पहुंचे, तब उनके पास सबसे बड़ा सहारा उनकी भाषा, लोकसंस्कृति और धार्मिक परंपराएं थीं। कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने भोजपुरी को अपनी पहचान और आत्मबल बनाए रखा। खेतों में काम करते समय वे बिरहा, कजरी, चैता और फगुआ गाते थे। इन लोकगीतों में गांव की याद, बिछड़ने का दर्द और बेहतर जीवन की उम्मीद झलकती थी। रामचरितमानस, हनुमान चालीसा और भजन-कीर्तन उनके मानसिक और आध्यात्मिक संबल बने।
लंबी और जोखिम भरी यात्रा के कारण कई लोग जहाजों पर ही बीमारियों और कुपोषण से दम तोड़ देते थे। मानसिक और शारीरिक दबाव के चलते आत्महत्या की घटनाएं भी आम थीं। इसके बावजूद गिरमिटिया मजदूरों ने हार नहीं मानी और अपने संघर्ष, संस्कृति और जीवन की जिजीविषा को जीवित रखा। यह केवल दर्द और शोषण की कहानी नहीं, बल्कि मानव साहस और आत्मसम्मान की अद्वितीय गाथा भी है।
– राजेंद्र प्रसाद, लेखक एवं गिरमिटिया वंशज
भोजपुरी भाषा ने प्रवासी भारतीयों को एकजुट रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही कारण है कि आज भी मॉरीशस, सूरीनाम और त्रिनिदाद जैसे देशों में भोजपुरी संस्कृति जीवित दिखाई देती है। मॉरीशस में भोजपुरी टीवी कार्यक्रम, रेडियो और सांस्कृतिक संस्थाएं सक्रिय हैं। सूरीनाम में भोजपुरी और अवधी के मेल से ‘सरनामी हिंदुस्तानी’ भाषा विकसित हुई, जबकि त्रिनिदाद में होली “फगवा” के रूप में बड़े सांस्कृतिक उत्सव की तरह मनाई जाती है।
गिरमिटिया समाज ने केवल अपनी संस्कृति को बचाया ही नहीं, बल्कि शिक्षा, राजनीति, साहित्य और व्यापार में भी नई पहचान बनाकर दुनिया को भारतीय संस्कृति की ताकत का एहसास कराया।
गिरमिटिया प्रथा और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन
गिरमिटिया प्रथा के खिलाफ संघर्ष ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को भी प्रभावित किया। बहुत कम लोग जानते हैं कि महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मजदूरों और प्रवासियों के साथ हो रहे नस्लीय भेदभाव और शोषण के खिलाफ जोरदार आवाज उठाई थी। वहां के अनुभवों ने गांधी के राजनीतिक और सामाजिक विचारों को नई दिशा दी।
भारत में भी गिरमिटिया मजदूरों की अमानवीय स्थिति को लेकर विरोध बढ़ने लगा। समाज सुधारकों, पत्रकारों और राजनीतिक नेताओं ने इस व्यवस्था को मानवाधिकारों के खिलाफ बताया। गोपाल कृष्ण गोखले और महात्मा गांधी जैसे नेताओं ने गिरमिट प्रथा को “नई गुलामी” करार देते हुए इसे समाप्त करने की मांग उठाई। भारतीय प्रेस में भी इस विषय पर लगातार लेख और रिपोर्ट प्रकाशित होने लगीं। बढ़ते जनदबाव और अंतरराष्ट्रीय आलोचना के कारण अंततः ब्रिटिश सरकार को 1917 में गिरमिटिया श्रम व्यवस्था समाप्त करनी पड़ी।
राजनीति, साहित्य और कला में गिरमिटिया समाज का प्रभाव
गिरमिटिया समुदाय ने समय के साथ केवल मजदूर समाज की पहचान तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि राजनीति, साहित्य और कला के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कीं। मॉरीशस में कई प्रधानमंत्री भारतीय मूल के रहे हैं, जबकि गुयाना और सूरीनाम में भारतीय मूल के नेताओं ने राष्ट्रपति और शीर्ष राजनीतिक पदों तक पहुंचकर वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। त्रिनिदाद एंड टोबैगो में भी भारतीय मूल के नेताओं ने राष्ट्रीय राजनीति और सामाजिक नीतियों को प्रभावित किया। बिहार को बेटी कमला प्रसाद विसेसर आज त्रिनिदाद की प्रधानमंत्री हैं.
साहित्य के क्षेत्र में अभिमन्यु अनत जैसे लेखकों ने प्रवासी भारतीयों के संघर्ष, विस्थापन और सांस्कृतिक पीड़ा को अपनी रचनाओं में जीवंत किया। वहीं भोजपुरी लोकसंगीत ने कैरेबियन संस्कृति पर गहरा प्रभाव डाला। ‘चटनी म्यूजिक’ इसका प्रमुख उदाहरण है, जिसमें भोजपुरी लोकधुनों और कैरेबियन संगीत का अनूठा संगम दिखाई देता है।

लंबी और जोखिम भरी यात्रा के कारण कई लोग जहाजों पर ही बीमारियों और कुपोषण से दम तोड़ देते थे। मानसिक और शारीरिक दबाव के चलते आत्महत्या की घटनाएं भी आम थीं। इसके बावजूद गिरमिटिया मजदूरों ने हार नहीं मानी और अपने संघर्ष, संस्कृति और जीवन की जिजीविषा को जीवित रखा। यह केवल दर्द और शोषण की कहानी नहीं, बल्कि मानव साहस और आत्मसम्मान की अद्वितीय गाथा भी है।
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