माटी की आवाज को शब्द दिया, वही भोजपुरी मेरी पहचान बनी: चंदेश्वर शर्मा ‘परवाना’

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चंदेश्वर शर्मा ‘परवाना’ भोजपुरी साहित्य में एक पहचान हैं, सही मायने में वो भोजपुरी को न केवल साधते हैं बल्कि उनके शब्दों में ओढ़ते और बिछाते भी हैं. Bhojpuri24.com के ‘भोजपुरी धुरंधर’ सीरीज में आज पढ़ें चंदेश्वर शर्मा ‘परवाना’ के बारे में –

कुशीनगर: भोजपुरी भाषा केवल बोलचाल का माध्यम नहीं, बल्कि लोकजीवन की आत्मा है। इस आत्मा को शब्द, स्वर और संवेदना देने वाले कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो पूरी जिंदगी अपनी भाषा और संस्कृति के संरक्षण में समर्पित कर देते हैं। ऐसे ही साहित्यकारों में एक नाम है चंदेश्वर शर्मा ‘परवाना’।
कुशीनगर की मिट्टी में जन्मे और गोरखपुर में साहित्यिक कर्म को विस्तार देने वाले ‘परवाना’ जी ने भोजपुरी को सिर्फ लिखा ही नहीं, बल्कि उसे जिया भी है। शिक्षक के रूप में समाज को शिक्षा देने के बाद उन्होंने अपनी दूसरी पारी भोजपुरी साहित्य और लोकसंस्कृति को समर्पित कर दी।

    उनकी रचनाओं में गांव की महक, लोकगीतों की मिठास, समाज की चिंता और संस्कृति की पीड़ा साफ दिखाई देती है। वे उन साहित्यकारों में हैं जो मानते हैं कि ‘भोजपुरी हमारी शान ही नहीं, हमारी पहचान भी है।’

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गांव की गलियों से साहित्य की दुनिया तक
चंदेश्वर शर्मा ‘परवाना’ का स्थायी निवास कुशीनगर जिले के मठही राजा गांव में है। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े परवाना जी ने बचपन से ही लोकगीतों, मेलों, संस्कार गीतों और गांव की जीवंत संस्कृति को करीब से देखा। यही अनुभव आगे चलकर उनकी साहित्यिक ऊर्जा बनी।

उन्होंने लंबे समय तक शिक्षक के रूप में सेवा दी। एक शिक्षक होने के कारण समाज, संस्कृति और नई पीढ़ी की मानसिकता को उन्होंने गहराई से समझा। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में शिक्षाप्रद दृष्टि और सामाजिक चेतना स्पष्ट दिखाई देती है। सेवानिवृत्ति के बाद भी उनकी सक्रियता कम नहीं हुई। आज भी वे लेखन, पेंटिंग और साहित्यिक आयोजनों के माध्यम से भोजपुरी के लिए निरंतर काम कर रहे हैं।

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गीतों में गांव, संवेदना और संघर्ष
‘परवाना’ जी की प्रकाशित पुस्तकों में भोजपुरी और हिंदी दोनों भाषाओं की रचनाएं शामिल हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में गँवई कs गाँती, दर्पन, गठरी, मकरंद और मेला जैसी पुस्तकें शामिल हैं।

इनकी रचनाओं में गांव का जीवन सिर्फ वर्णित नहीं होता, बल्कि जीवंत हो उठता है। खेत-खलिहान, चौपाल, लोकरीति, रिश्तों की गर्माहट और बदलते सामाजिक मूल्य उनकी कविताओं और गीतों में सहज रूप से दिखाई देते हैं।

उनकी पुस्तक गठरी को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार मिलना उनके साहित्यिक योगदान की महत्वपूर्ण पहचान है। यह सम्मान बताता है कि भोजपुरी साहित्य केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि गंभीर साहित्यिक विमर्श का विषय भी है।

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भोजपुरी को शब्दों में नहीं, आंदोलन में बदलने की कोशिश
चंदेश्वर शर्मा ‘परवाना’ केवल लेखक नहीं, बल्कि भोजपुरी के सांस्कृतिक कार्यकर्ता भी हैं। उन्होंने भोजपुरी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की मुहिम में सक्रिय भूमिका निभाई है। गोरखपुर में ‘भोजपुरी संगम’ के बैनर तले आयोजित होने वाली मासिक ‘बइठकी’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से उन्होंने साहित्यकारों, कलाकारों और युवाओं को जोड़ने का काम किया। उनका मानना है कि भाषा तभी जीवित रहती है, जब समाज उसके प्रति आत्मीयता बनाए रखे।

वे भोजपुरी में गद्य लेखन को बढ़ावा देने पर विशेष जोर देते हैं। उनका कहना है कि भोजपुरी केवल गीत-संगीत की भाषा बनकर नहीं रहनी चाहिए, बल्कि शोध, कहानी, आलोचना और आधुनिक साहित्य की भी मजबूत भाषा बननी चाहिए।

आकाशवाणी और दूरदर्शन से जन-जन तक पहुंची आवाज़

परवाना जी की साहित्यिक पहचान केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रही। आकाशवाणी गोरखपुर से उनके नियमित काव्यपाठ, भोजपुरी संगीत रूपक और लोकगीत प्रसारित होते रहे हैं। वे लोकगीत स्वर परीक्षक की भूमिका में भी जुड़े रहे।
अरुणाचल में भोजपुरी काव्य पाठ में भी शामिल हो चुके हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि भोजपुरी संस्कृति अब केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में अपनी पहचान बना चुकी है। दूरदर्शन गोरखपुर, लखनऊ, मऊ और वाराणसी केंद्रों से उनके काव्यपाठ, नाटक और भोजपुरी कार्यक्रमों का प्रसारण हुआ। उनकी लेखनी का प्रभाव सिनेमा तक भी पहुंचा और उन्होंने भोजपुरी फिल्म ‘विधना तहरे देस में’ के लिए गीत लिखे।

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बड़े गायकों ने दिए उनके गीतों को स्वर

किसी भी गीतकार के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि तब होती है, जब उसकी रचनाओं को प्रतिष्ठित कलाकार अपनी आवाज़ दें। परवाना जी के गीतों को केवल कुमार, पद्मा गिडवानी, भरत शर्मा व्यास, कमलेश हरिपुरी, रामदरश शर्मा, अंटू भोजपुरिया और कृष्णा नंद त्रिपाठी जैसे चर्चित कलाकारों ने स्वर दिया।
उनके गीतों की विशेषता यह है कि उनमें लोकभाषा की सहजता और भावनात्मक गहराई दोनों मौजूद हैं। वे बनावटीपन से दूर रहते हैं और सीधे आम आदमी के जीवन से जुड़ते हैं।

भोजपुरी के सामने खड़े संकटों को लेकर गंभीर चिंता
चंदेश्वर शर्मा ‘परवाना’ भोजपुरी संस्कृति के बदलते स्वरूप को लेकर चिंतित भी हैं। उनका मानना है कि आधुनिकता और बाजारवाद के दौर में पारंपरिक लोकगीत, लोकनृत्य और संस्कार गीत धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं। भोजपुरी 24 से बातचीत में वे कहते हैं कि नई पीढ़ी अपनी भाषा और लोकसंस्कृति से दूर होती जा रही है। पारंपरिक खान-पान, परिधान और पारिवारिक संवाद में भी भोजपुरी की जगह कम होती जा रही है।
उनकी चिंता केवल भाषा को लेकर नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक ताने-बाने को लेकर है जो भोजपुरी समाज की आत्मा रहा है। वे अश्लीलता और सतही मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव को भी भोजपुरी की गरिमा के लिए खतरा मानते हैं।

नई पीढ़ी से उम्मीदें और साहित्य से संवाद


परवाना जी का विश्वास है कि यदि युवाओं को भोजपुरी साहित्य की असली ताकत से परिचित कराया जाए, तो वे जरूर अपनी भाषा की ओर लौटेंगे।
वे युवाओं को भोजपुरी में लेखन और अध्ययन के लिए प्रेरित करते हैं। उनका मानना है कि भोजपुरी को केवल भावनात्मक नहीं, बौद्धिक आधार भी देना होगा। शोध, शब्दकोश निर्माण और साहित्यिक विमर्श जैसे कार्यों में उनकी सक्रियता इसी सोच को दर्शाती है। वे केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा द्वारा आयोजित भोजपुरी-हिंदी-अंग्रेजी शब्दकोश निर्माण कार्यशाला में विषय विशेषज्ञ के रूप में भी अपनी भूमिका निभा चुके हैं।

भोजपुरी हमारी पहचान है, यह एक जीवन दर्शन भी है
चंदेश्वर शर्मा ‘परवाना’ का जीवन भोजपुरी भाषा और लोकसंस्कृति के प्रति समर्पण की मिसाल है। उन्होंने न तो लोकप्रियता के लिए लिखा और न ही पुरस्कारों के लिए। उनका उद्देश्य हमेशा भोजपुरी की अस्मिता को बचाए रखना रहा। वे अक्सर कहते हैं कि कुछ ही लिख पाया हूँ, अभी बहुत कुछ लिखना है।

 भोजपुरी हमारी शान है, भोजपुरी हमारी पहचान है। यह वाक्य केवल एक साहित्यकार का कथन नहीं, बल्कि उस व्यक्ति का जीवन-दर्शन है जिसने पूरी निष्ठा से अपनी मातृभाषा को समर्पित जीवन जिया है।
आज जब भाषाएं बाजार और तकनीक के दबाव में अपनी पहचान खो रही हैं, तब चंदेश्वर शर्मा ‘परवाना’ जैसे साहित्यकार हमें यह याद दिलाते हैं कि भाषा केवल शब्द नहीं होती, वह हमारी संस्कृति, स्मृति और अस्तित्व की पहचान होती है।

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