पितृपक्ष का समापन आज, अमावस्या पर होगा पितरों का विसर्जन; जानें तर्पण, पंचबलि और श्राद्ध का महत्व

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आचार्य शशांक शास्त्री के अनुसार, पितृ विसर्जनी अमावस्या पर तर्पण, पिंडदान, पंचबलि और ब्राह्मण भोज का विशेष महत्व है। श्रद्धा और विधि-विधान से पितरों का स्मरण करना इस परंपरा का प्रमुख उद्देश्य है।

भोजपुरी24.com | धर्म-संस्कृति

पितृपक्ष के समापन के साथ अमावस्या के दिन पितरों के विसर्जन की परंपरा निभाई जाती है। इसे पितृ विसर्जनी अमावस्या, महालया और सर्वपितृ अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन उन पितरों का श्राद्ध और तर्पण भी किया जाता है, जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती। अमावस्या या पूर्णिमा को मृत्यु होने पर भी इस दिन श्राद्ध करने की परंपरा है।

आचार्य शशांक शास्त्री बताते हैं कि पितृपक्ष के पंद्रह दिनों में तर्पण और श्राद्ध के माध्यम से पूर्वजों का स्मरण किया जाता है। मान्यता है कि अमावस्या के दिन पितर अपने परिजनों के यहां आते हैं और श्राद्ध-तर्पण से संतुष्ट होकर आशीर्वाद देते हुए अपने लोक लौट जाते हैं।

देवोत्सव, पितरोत्सव और मनुष्योत्सव का महत्व

आचार्य शशांक शास्त्री के अनुसार, देवोत्सव, पितरोत्सव और मनुष्योत्सव तीन प्रमुख उत्सव हैं। मनुष्य को इन तीनों को मनाने का सौभाग्य प्राप्त है। माता-पिता और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना भारतीय धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

वे बताते हैं कि शरीर नश्वर है और आत्मा को अमर माना गया है। जीवन और मृत्यु के इस शाश्वत सत्य के बीच मनुष्य को अपने कर्मों के साथ-साथ पूर्वजों के प्रति अपने कर्तव्यों का भी स्मरण करना चाहिए।

पितृ विसर्जनी अमावस्या पर क्या करें?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्राद्धकर्ता स्नान के बाद तर्पण, पिंडदान और अन्य श्राद्ध कर्म करते हैं। इसके बाद पंचबलि निकालने और ब्राह्मणों को भोजन कराने की परंपरा है।

पंचबलि में गाय, कुत्ता, कौआ, देवाधिदेव तथा चींटी सहित अन्य छोटे जीवों के लिए भोजन निकालने का विधान बताया गया है। इसका उद्देश्य धार्मिक परंपरा के अनुसार विभिन्न जीवों के प्रति दायित्व और सम्मान का भाव प्रकट करना है। देवाधिदेव की श्रेणी में सिद्ध, यक्ष और गंधर्व आदि का उल्लेख किया गया है।

आचार्य शास्त्री के अनुसार, श्राद्ध में भोजन और दान के साथ श्रद्धा, शुद्धता तथा विधि-विधान का विशेष ध्यान रखना चाहिए। ब्राह्मणों को सम्मानपूर्वक भोजन कराने और दक्षिणा देने की परंपरा भी इसी का हिस्सा है।

श्राद्ध के दौरान इन बातों का रखें ध्यान

आचार्य शशांक शास्त्री बताते हैं कि श्राद्ध कर्म में संयम और श्रद्धा को विशेष महत्व दिया गया है। उनके अनुसार, भोजन के समय आमंत्रित ब्राह्मणों को अनावश्यक रूप से बातचीत के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए। भोजन की व्यवस्था सम्मानपूर्वक करनी चाहिए और धार्मिक परंपराओं के अनुसार अतिथियों को विदा करने के बाद परिवार के अन्य सदस्यों के साथ भोजन करना चाहिए।

यदि श्राद्धकर्ता उस दिन उपवास रखता है, तो उसके लिए परंपरा के अनुसार अलग व्यवस्था बताई गई है। आचार्य के मुताबिक, ऐसी स्थिति में भोजन का अंश गाय को अर्पित करने की परंपरा का पालन किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि गया में श्राद्ध कर चुके लोगों के लिए भी अमावस्या के दिन तर्पण, पंचबलि और ब्राह्मण भोजन कराने की परंपरा बताई गई है।

गीता में भी श्रद्धा को दिया गया महत्व

आचार्य शशांक शास्त्री ने भगवद्गीता के एक श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी भी धार्मिक कर्म में श्रद्धा का विशेष महत्व है।

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह।।

इसका भावार्थ है कि श्रद्धा के बिना किया गया हवन, दान, तप और अन्य शुभ कर्म सार्थक नहीं माने जाते। आचार्य के अनुसार, श्राद्ध में तन, मन, धन और वाणी की शुद्धता का ध्यान रखना चाहिए।

पितृपक्ष का समापन पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, स्मरण और पारिवारिक परंपराओं के निर्वहन का अवसर है। इस दिन तर्पण, श्राद्ध, दान और जरूरतमंदों की सहायता जैसे कार्यों के माध्यम से भी पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त किया जा सकता है।

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