गया का तिलकुट है परंपरा, स्वाद और करोड़ों के कारोबार की अनोखी पहचान

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पल्लवी कश्यप की रिपोर्ट

गया (बिहार): गया की पवित्र धरती पर, जहाँ हर कण में इतिहास और आस्था बसती है, वहीं जन्म लेती है एक ऐसी मिठास जो सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि परंपरा की पहचान है प्रसिद्ध तिलकुट। बिहार का ऐतिहासिक शहर गया केवल अपने धार्मिक महत्व और पिंडदान के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी प्रसिद्ध मिठाई तिलकुट के लिए भी पूरे देश में जाना जाता है। तिलकुट मुख्य रूप से बिहार के गया की 150 साल से अधिक पुरानी पारंपरिक मिठाई है, जो मकर संक्रांति पर खासतौर पर खाई जाती है।

तिलकुट बनाने की प्रक्रिया और इतिहास
तिलकुट बनाने के लिए तिल को भूनकर कूटा जाता है। तिल को कूटकर बनाने की प्रक्रिया के कारण ही इसका नाम ‘तिलकुट’ पड़ा है। तिलकुट बनाने की परंपरा मुख्यतः पूर्वांचल, बिहार और झारखंड में प्रचलित है। हालांकि अन्य राज्यों में भी तिल से बने स्नैक्स जैसे गज्जक या तिलपट्टी लोकप्रिय हैं।

वैसे तो इसका स्वाद साल भर लिया जा सकता है, लेकिन यह खासतौर पर मकर संक्रांति से जुड़ा हुआ है। इस दिन घरों में तिलकुट बनाया जाता है और रिश्तेदारों व पड़ोसियों में बांटा जाता है।

तिलकुट की जड़ें विशेष रूप से गया जिले से जुड़ी हैं। लगभग 150 वर्षों के इतिहास के साथ इसकी उत्पत्ति रमना के टेकारी रियासत से मानी जाती है, जो आज भी प्रामाणिक तिलकुट के लिए प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि टेकारी के राजा को तिलकुट बहुत पसंद था और उन्होंने इसके उत्पादन को बढ़ावा दिया। उन्होंने क्षेत्र में गन्ने की खेती को भी प्रोत्साहित किया, क्योंकि इस मिठाई में गुड़ का उपयोग होता है।

कई इतिहासकारों के अनुसार, तिलकुट की परंपरा मौर्यकाल तक जाती है। प्राचीन ग्रंथों में भी तिल और गुड़ से बनी मिठाइयों का उल्लेख मिलता है। पहले यह मिठाई खास धार्मिक अवसरों तक सीमित थी, लेकिन समय के साथ इसकी लोकप्रियता बढ़ती गई और यह गया की पहचान बन गई।

पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल तक भेजा जाता
गया में बने तिलकुट के स्वाद का मुकाबला कहीं नहीं है। यही कारण है कि यहाँ का तिलकुट झारखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और महाराष्ट्र के अलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल तक भेजा जाता है। गया आने वाले लोग यहाँ का तिलकुट जरूर खरीदते हैं और अपने रिश्तेदारों के लिए भी ले जाते हैं। कहा जाता है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी गया के तिलकुट की प्रशंसक थीं। उन्होंने इसे चखने के बाद कहा था कि ऐसी मिठाई उन्होंने कहीं और नहीं खाई।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तिल को पवित्र माना जाता है और इसे भगवान यम का आशीर्वाद प्राप्त है। इसलिए तिलकुट को समृद्धि और शुभता का प्रतीक भी माना जाता है।

करोड़ों का कारोबार
गया का तिलकुट सिर्फ स्वाद और परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आज करोड़ों रुपये के कारोबार का एक मजबूत स्तंभ बन चुका है। खासकर सर्दियों और मकर संक्रांति के समय इसका व्यापार चरम पर होता है।
गया शहर में तिलकुट का निर्माण मुख्यतः छोटे-छोटे कुटीर उद्योगों के रूप में होता है। यहाँ लगभग 200 से 300 दुकानें और छोटे कारखाने इस काम से जुड़े हैं। इन जगहों पर आज भी पारंपरिक तरीके से, हाथों की मेहनत से तिलकुट बनाया जाता है, जिससे इसकी गुणवत्ता और स्वाद बरकरार रहता है।

इस उद्योग से हजारों कारीगर और मजदूर जुड़े हुए हैं। तिल भूनने, कूटने, गुड़ या चीनी मिलाने और आकार देने तक हर प्रक्रिया में अलग-अलग लोगों की भूमिका होती है। सर्दियों में यह काम और तेज हो जाता है, जिससे अस्थायी रोजगार भी बढ़ता है।

अनुमान के अनुसार, गया का तिलकुट उद्योग हर साल कई करोड़ रुपये का कारोबार करता है। मकर संक्रांति के आसपास लाखों किलो तिलकुट की बिक्री होती है। अब ऑनलाइन ऑर्डर और कूरियर के जरिए यह मिठाई देश-विदेश तक पहुंचने लगी है।

पितृपक्ष मेले के दौरान, जब लाखों श्रद्धालु गया आते हैं, तब भी तिलकुट की मांग काफी बढ़ जाती है। लोग इसे प्रसाद और उपहार के रूप में खरीदते हैं, जिससे व्यापार को और गति मिलती है।

यह उद्योग किसानों के लिए भी लाभकारी है। तिल की बढ़ती मांग के कारण आसपास के क्षेत्रों में इसकी खेती को बढ़ावा मिला है, जिससे कृषि और उद्योग के बीच मजबूत संबंध बना है। हालांकि, इस उद्योग को कुछ चुनौतियों का सामना भी करना पड़ता हैजैसे बढ़ती लागत, मशीन से बने उत्पादों की प्रतिस्पर्धा और ब्रांडिंग की कमी। फिर भी, गया के कारीगर अपनी पारंपरिक विधियों और गुणवत्ता के दम पर इस पहचान को बनाए हुए हैं।

अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि गया का तिलकुट आज सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि हजारों लोगों की आजीविका और करोड़ों के कारोबार की पहचान बन चुका है। यह परंपरा और आधुनिक व्यापार का ऐसा संगम है, जो हर साल नई ऊँचाइयों को छू रहा है।

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