आम-केला-पपीता खरीदते समय सतर्क रहें, हर पीला फल सुरक्षित नहीं

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कैल्शियम कार्बाइड से दूरी, सुरक्षित फलों से दोस्ती

प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह, विभागाध्यक्ष, पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी, प्रधान (अतिरिक्त प्रभार), केला अनुसंधान संस्थान, गोरौल, हाजीपुर (बिहार)

हाजीपुर: आम, केला और पपीता भारतीय भोजन का अहम हिस्सा हैं। ये सिर्फ स्वाद ही नहीं देते, बल्कि शरीर को ऊर्जा, विटामिन और खनिज भी प्रदान करते हैं। लेकिन बाजार में जल्दी मुनाफा कमाने की होड़ ने फलों की प्राकृतिक गुणवत्ता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आज उपभोक्ता के सामने सबसे बड़ा सवाल है—जो फल दिखने में सुंदर और पीले हैं, क्या वे वास्तव में सुरक्षित भी हैं?

प्राकृतिक पकाव: विज्ञान और प्रकृति का संतुलन
फल का पकना एक जटिल जैव-रासायनिक प्रक्रिया है, जिसमें एथिलीन गैस महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह गैस फल के अंदर ही बनती है और धीरे-धीरे स्टार्च को शर्करा में बदलती है, जिससे फल मीठा होता है। रंग बदलता है, गूदा नरम होता है और खुशबू विकसित होती है। आम, केला और पपीता जैसे क्लाइमेक्टेरिक फल पेड़ से तोड़ने के बाद भी प्राकृतिक रूप से पकते रहते हैं।

खतरनाक शॉर्टकट है कैल्शियम कार्बाइड का जाल
तेजी से पकाने के लिए कुछ व्यापारी कैल्शियम कार्बाइड का उपयोग करते हैं, जो पानी के संपर्क में आकर एसीटिलीन गैस छोड़ता है। यह गैस फल को बाहर से जल्दी पीला कर देती है, लेकिन अंदर से वह कच्चा रह जाता है। इसके गंभीर दुष्प्रभाव हो सकते हैं सिरदर्द, उल्टी, चक्कर, आंखों में जलन और लंबे समय में विषाक्त असर। यही कारण है कि इस रसायन का उपयोग पूरी तरह प्रतिबंधित है, फिर भी कुछ जगहों पर इसका अवैध प्रयोग जारी है।

सुरक्षित विकल्प है वैज्ञानिक रिपनिंग तकनीक
विशेषज्ञों के अनुसार फलों को पकाने का सबसे सुरक्षित तरीका है नियंत्रित एथिलीन गैस का उपयोग। आधुनिक रिपनिंग चैंबर में तापमान और नमी को नियंत्रित कर फलों को समान रूप से पकाया जाता है। इससे फल का स्वाद, रंग और पोषण बरकरार रहता है और स्वास्थ्य पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता।

ऐसे पहचानें सुरक्षित और असुरक्षित फल
उपभोक्ता कुछ सरल तरीकों से खुद ही फर्क समझ सकते हैं:
रंग: प्राकृतिक फल में समानता, जबकि कृत्रिम में धब्बे या अत्यधिक पीला रंग

गंध: प्राकृतिक फल में मीठी खुशबू, रसायन वाले में गंध कम
स्पर्श: प्राकृतिक फल समान रूप से नरम, कृत्रिम में ऊपर नरम अंदर सख्त
स्वाद: प्राकृतिक फल मीठा और संतुलित, कृत्रिम फीका या अधपका

नई तकनीक यानी स्ट्रिप पेपर टेस्ट से जांच आसान
अब खाद्य सुरक्षा एजेंसियां स्ट्रिप पेपर टेस्ट का उपयोग कर रही हैं। इसमें फल को बंद डिब्बे में रखकर एक विशेष पेपर के जरिए गैस की पहचान की जाती है। रंग बदलने से पता चलता है कि फल को कृत्रिम तरीके से पकाया गया है या नहीं। यह तकनीक बाजार में पारदर्शिता बढ़ाने और उपभोक्ताओं को सुरक्षित विकल्प देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

जागरूक उपभोक्ता ही सबसे बड़ी ताकत
आज का उपभोक्ता पहले से ज्यादा सतर्क है। लोग अब ऑर्गेनिक और प्राकृतिक उत्पादों की मांग कर रहे हैं, विश्वसनीय विक्रेताओं से खरीदारी कर रहे हैं और फूड सेफ्टी को प्राथमिकता दे रहे हैं। खरीदते समय कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है-
अत्यधिक चमकीले और एकसमान पीले फल से बचें
मौसम के अनुसार फल खरीदें
कटे-फटे फल न लें
घर पर फलों को अच्छी तरह धोकर ही खाएं

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