फ्रांसेस्का ओरसिनी, जब लंदन से गूंजे भोजपुरी के बोल
लंदन/गोरखपुर: भोजपुरी सिर्फ एक भाषा नहीं, बल्कि भावना है, माटी की खुशबू, लोकगीतों की मिठास और जनजीवन की सादगी का संगम भी है। लेकिन जब इस लोकभाषा की गूंज लंदन जैसे वैश्विक शैक्षणिक केंद्रों में सुनाई दे, तो यह गर्व का विषय बन जाता है। फ्रांसेस्का ओरसिनी, SOAS यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन की प्रोफेसर इमेरिटा, वही नाम हैं जिन्होंने हिंदी-उर्दू के साथ-साथ भोजपुरी जैसी लोकभाषाओं को भी अंतरराष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया। उनका काम यह साबित करता है कि भोजपुरी सिर्फ गांव की भाषा नहीं, बल्कि वैश्विक पहचान वाली सांस्कृतिक शक्ति है।
एक अंतरराष्ट्रीय विदुषी का सफर
फ्रांसेस्का ओरसिनी का नाम भारतीय भाषाओं के अध्ययन में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। इटली में जन्मीं और लंदन में कार्यरत ओरसिनी ने अपने अकादमिक जीवन को भारतीय साहित्य और भाषाओं के अध्ययन को समर्पित किया। SOAS (School of Oriental and African Studies) जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में उन्होंने हिंदी-उर्दू साहित्य के साथ-साथ भारतीय लोक परंपराओं पर गहन शोध किया।
उनकी विशेषता यह रही कि उन्होंने केवल क्लासिकल साहित्य तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि लोकभाषाओं और जनसाहित्य को भी उतनी ही गंभीरता से अध्ययन का विषय बनाया। भोजपुरी, जो अक्सर मुख्यधारा के अकादमिक विमर्श से बाहर रहती है, उसे उन्होंने वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने का काम किया।
उनका दृष्टिकोण यह था कि किसी भी भाषा की असली ताकत उसके लोक में होती है गीतों, कहानियों और मौखिक परंपराओं में। यही कारण है कि उन्होंने भोजपुरी लोकगीतों, नाटकों और कथाओं को शोध का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया।
भोजपुरी लोकधारा को वैश्विक पहचान
भोजपुरी लोक संस्कृति चाहे वह सोहर हो, कजरी, बिरहा या चैता आदि हमेशा से जनमानस की अभिव्यक्ति रही है। लेकिन इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर अध्ययन का विषय बनाने का काम बहुत कम लोगों ने किया। फ्रांसेस्का ओरसिनी इस मामले में अग्रणी रही हैं।
उन्होंने अपने शोध में यह दिखाया कि भोजपुरी लोकगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की संरचना, भावनाओं और इतिहास का दस्तावेज हैं। उदाहरण के लिए, प्रवासी मजदूरों के गीतों में बिछड़ने का दर्द, महिलाओं के गीतों में सामाजिक बंधनों की झलक, और त्योहारों के गीतों में सामूहिकता की भावना साफ दिखाई देती है।
उनका मानना है कि भोजपुरी जैसी भाषाएं सबऑल्टर्न वॉयस यानी आम जनता की आवाज हैं, जिन्हें समझे बिना भारतीय समाज को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। उनके शोध कार्यों ने यह स्थापित किया कि भोजपुरी कोई हाशिए की भाषा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और गहरी परंपरा वाली भाषा है।
शोध, किताबें और अकादमिक योगदान
फ्रांसेस्का ओरसिनी ने कई महत्वपूर्ण किताबें और शोध पत्र लिखे हैं, जिनमें भारतीय साहित्य और लोकसंस्कृति के विविध पहलुओं को उजागर किया गया है। उनकी चर्चित कृतियों में The Hindi Public Sphere और Print and Pleasure शामिल हैं, जिनमें उन्होंने भारतीय भाषाओं के विकास और उनके सामाजिक प्रभाव का विश्लेषण किया है।
उन्होंने मल्टीलिंगुअल इंडिया की अवधारणा को भी मजबूती दी यानि भारत को एक ऐसी भूमि के रूप में देखना, जहां कई भाषाएं और संस्कृतियां साथ-साथ विकसित होती हैं। इस दृष्टिकोण में भोजपुरी जैसी भाषाओं को भी समान महत्व दिया गया।
उनके शोध का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उन्होंने प्रिंट और ओरल यानी लिखित और मौखिक परंपराओं के बीच के संबंध को समझाया। उन्होंने दिखाया कि कैसे लोकगीत और कहानियां, जो पीढ़ियों से मौखिक रूप में चलती आई हैं, समाज की स्मृति और पहचान को बनाए रखती हैं।
भोजपुरी नजरिया, माटी से दुनिया तक
भोजपुरी एंगल से देखें तो फ्रांसेस्का ओरसिनी का काम एक सेतु की तरह है जो गांव की चौपाल को लंदन के क्लासरूम से जोड़ता है। उन्होंने यह साबित किया कि जे भाषा गांव में बोली जाला, वही दुनिया में गूंज सकेला। उनके प्रयासों से भोजपुरी को केवल लोकल नहीं, बल्कि ग्लोबल पहचान मिली। आज जब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और सोशल मीडिया के माध्यम से भोजपुरी कंटेंट दुनिया भर में देखा जा रहा है, तो उसमें कहीं न कहीं ओरसिनी जैसे विद्वानों के शोध का भी योगदान है, जिन्होंने पहले ही इस भाषा की क्षमता को पहचान लिया था।
भोजपुरी में कहें तोजवन बोली में माई लोरी सुनावेली, ओही बोली के इज्जत अब लंदन तक पहुंच गइल बा। यह सिर्फ एक भाषा की जीत नहीं, बल्कि उस पूरी संस्कृति की जीत है, जिसे लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया।
ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती
फ्रांसेस्का ओरसिनी का जीवन और कार्य हमें यह सिखाता है कि भाषा और संस्कृति की कोई सीमाएं नहीं होतीं। एक विदेशी विदुषी द्वारा भारतीय लोकभाषाओं के लिए किया गया यह योगदान न केवल सराहनीय है, बल्कि प्रेरणादायक भी है। आज जरूरत है कि हम खुद अपनी भाषाओं और परंपराओं को समझें, उन्हें सम्मान दें और आगे बढ़ाएं। क्योंकि जब दुनिया हमारी भाषा को पहचान रही है, तो हमें भी उस पर गर्व करना चाहिए। bhojpuri24.com के पाठकों के लिए संदेश- अपनी माटी, अपनी बोली, ई हमरा पहचान ह। जइसे ओरसिनी जी समझली, वैसे हमहूं समझीं, तबे भोजपुरी के असली मान बढ़ी।


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