पटना/मॉरिशस : अपने भोजपुरी क्षेत्र से हजारों मील दूर मॉरिशस के गन्ने के खेतों और नीले समुद्र के बीच एक महिला भोजपुरी के पुराने गीतों को जीवित रखे हुए है। उनका नाम है डॉ. सरिता बूढ़ू। विदेश में रहकर भी उन्होंने भोजपुरी लोक साहित्य और गिर्मिटिया संस्कृति को बचाने का अनूठा काम किया है।
बचपन से जुड़ी भोजपुरी विरासत
डॉ. सरिता बूढ़ू का जन्म मॉरिशस की राजधानी पोर्ट लुई में हुआ। उनके पूर्वज 19वीं सदी में बिहार और पूर्वांचल से गिर्मिटिया मजदूर बनकर वहाँ गए थे। घर में दादी-नानी सोहर, विवाह गीत, रोपनी गीत और बिदेसिया गाती थीं। बचपन से ही सरिता जी इन गीतों से प्रभावित रहीं। स्कूल में अंग्रेजी और फ्रेंच पढ़ाई होती थी, लेकिन घर की भाषा भोजपुरी थी। बड़े होते-होते उन्हें लगा कि युवा पीढ़ी अपनी मातृभाषा भूलती जा रही है। तभी उन्होंने फैसला किया कि भोजपुरी को कभी मरने नहीं देंगे।
संस्थान की नींव और संघर्ष
साल 1982 में सरिता जी ने मॉरिशस भोजपुरी इंस्टीट्यूट की स्थापना की। शुरू में बहुत विरोध हुआ। लोग कहते थे, ‘भोजपुरी क्या संस्कृति है? यह तो सिर्फ खेतों की बोली है।’ लेकिन सरिता जी नहीं रुकीं। उन्होंने पुराने गिर्मिटिया परिवारों के घर-घर जाकर लोकगीत रिकॉर्ड किए, उनकी कहानियाँ लिखीं और गहन शोध कार्य शुरू किया। कई सालों तक उन्होंने अकेले यह मुहिम चलाई।
दो महत्वपूर्ण किताबें और यूनेस्को सम्मान
उनकी मेहनत रंग लाई। उन्होंने दो बड़ी किताबें लिखीं, ‘कन्यादान: द व्हाईज ऑफ हिंदू मैरिज रिचुअल्स’ और ‘गीत गवाई An Ode to Geetharines of Mauritius’। ‘गीत गवाई’ में उन्होंने मॉरिशस में प्रचलित भोजपुरी सोहर, विवाह गीत, विदाई गीत आदि का पूरा खजाना समेटा। इन प्रयासों से वर्ष 2016 में ‘गीत गवाई’ परंपरा को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल किया गया। यह उनके शोध का सबसे बड़ा फल था।
प्रवासी भारतीय सम्मान से सम्मानित
जनवरी 2025 में भुवनेश्वर में हुए प्रवासी भारतीय दिवस समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने डॉ. सरिता बूढ़ू को प्रवासी भारतीय सम्मान प्रदान किया। यह विदेश में भारतीय भाषा और संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है। इससे पहले उन्हें मॉरिशस सरकार का दूसरा सर्वोच्च सम्मान ‘GOSK’ भी मिल चुका है।
बच्चों को सिखा रही भोजपुरी गीत
आज डॉ. सरिता बूढ़ू भोजपुरी स्पीकिंग यूनियन की पूर्व चेयरपर्सन हैं। उन्होंने स्कूलों में भोजपुरी गीत सिखाने के लिए ‘गीत गवाई स्कूल’ शुरू किया है। सैकड़ों बच्चे हर हफ्ते भोजपुरी सोहर, झूमर और लोकगीत सीख रहे हैं। वे कहती हैं, ‘भोजपुरी हमारी माँ है। जब तक बच्चे इसके गीत गाएँगे, हमारी जड़ें कभी नहीं सूखेंगी।’ डॉ. सरिता बूढ़ू की यह यात्रा हमें सिखाती है कि समुद्र कितना भी गहरा हो, अगर जुनून और समर्पण हो तो अपनी संस्कृति को हजारों मील दूर भी जीवित रखा जा सकता है। उनकी कहानी पूर्वांचल और बिहार के लिए गर्व की बात है।

