भोजपुरी क्रिया की कार्य-प्रकृति, एक व्याकरणिक अध्ययन

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गोपाल अश्क, नेपाल

भोजपुरी, प्राकृत से विकसित भइल एगो जीवंत भाषा ह। भारत के बिहार राज्य के पुराना नगर भोजपुर में बोलल गइला के चलते एकर नामकरण भोजपुरी कइल गइल बा। पहिले ई भाषा कैथि लिपि में लिखल जात रहे, बाकिर वर्तमान समय में देवनागरी लिपि में लिखल जा रहल बा (अश्क आ शर्माः २०७७, पृ.सं.२७)। ई भारतीय आर्यभाषा परिवार के एगो महत्त्वपूर्ण भाषा ह। भोजपुरी व्याकरण के लेखन-परंपरा काफी समृद्ध आ लमहर रहल बा।

क्रिया से ही कवनो भाषा के पहचान होला, ना कि शब्दन के प्रयोग से। क्रिया ऊ शब्द ह, जवन कवनो कार्य, घटना, या स्थिति के बोध करावेला। दोसरा शब्द में त क्रिया ऊ शब्द ह जवन बतावेला कि काम हो रहल बा या कइल जा रहल बा (अधिकारी, वि.सं. २०४९) ।

भोजपुरी क्रिया के कार्य प्रकृति

वाक्य में क्रिया ही ऊ घटक ह, जेकर प्रकृति के अनुसार कारक सब निर्धारित आ व्याख्येय होले स। क्रियन के कार्य के विस्तृत पहचान कइल आवश्यक होला। भोजपुरी क्रिया सब आपन विभिन्न कार्य प्रकृति के एह तरे बोध करावेले स – अवस्थिति, प्रक्रिया, अभिकार्य, अभिकार्य-प्रक्रिया । एहिजा भोजपुरी क्रिया के विभिन्न कार्य-प्रकृति के बारे में निम्नानुसार चर्चा कइल जा रहल बाः

1-अवस्थिति

अवस्थिति के अर्थ ह कवनी वस्तु भा घटना के सटीक स्थान । मूलतः अवस्था के बोध करावेवाला कार्य-प्रकृति के अवस्थिति कहल जाला। (चेफ १९७०, ९८-९९) के अनुसार अवस्थिति अथवा प्रक्रिया जवना से अभिकार्य व्यक्त ना होखे, ओइसन क्रियन के अवस्थिति कहल जाला। अवस्थिति से कवनो घटन-विघटन के बोध होखे के संभावना ना होखे। जइसे-

  1. गोपाल बीमार बा।
  2. कपड़ा नीमन बा। 

उपर्युक्त वाक्यन में बीमार (बा) आ नीमन (बा)  से कवनो प्रक्रिया भा घटना के बोध ना कराके क्रमशः गोपाल आ कपड़ा के अवस्थिति से खास तरह के स्वभावगत अवस्था दर्शित बा। एह वाक्यन के ‘‘गोपाल बीमारी के अवस्था में बा’’ आ ‘‘कपड़ा नीमन अवस्था में बा’’ जइसन शब्दान्तर से भी प्रकट कइल जा सकत बा, आ ई एकनी में रहल अवस्थिति के प्रमाणो ह। इहाँ बीमार आ नीमन विधेयात्मक विशेषण के रूप में नजर अइला से एकनीका क्रिया के अंग भइल बाड़े स। विशेषणन के मूलतः अवस्था में प्रधान मनला के कारण (लैकोफ, १९७०, १२१) अवस्थितिक क्रिया के साथ एकनी के निकटता दिखाई देवेला। क-ख वाक्य में ‘‘बा’’ विधेयात्मक दृष्टि से मुख्य बनल ‘‘बीमार’’ आ ‘‘नीमन’’ के अवस्थिति के व्यक्त करे खातिर वाक्यात्मक रूप में सहायक के काम कइले बा।

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खाली विशेषणे ना, बल्कि नाम भी अवस्था बोधक विशेषक होके प्रयुक्त भइल दिखाई देवेला, जइसे–

  1. गोपाल शिक्षक ह।

एह वाक्य के अभिप्राय ह-गोपाल शिक्षक के हैसियत में चाहे अवस्था में बा। अतः एहिजा शिक्षक गोपाल के पद-प्रतिष्ठा के स्थिति के बोध करावत बा। अवस्थितिक क्रियन से काल विभेदक भी लिहल जा सकत बाः

  1. कपड़ा नीमन रहे।

वाक्य (ख) कपड़ा के नीमन रहला के अवस्था के बोध करइले बा, त वाक्य (घ) कपड़ा नीमन अवस्था में रहे के बोध करइले बा। एह से ‘‘नीमन बा’’ आ ‘‘नीमन रहे’’ के बीच के कालिक सीमा फरक भइलो पर कार्य प्रकृतिगत भिन्नता नइखे दिखाई देत। उक्त दुनू वाक्यन में वर्तमान आ भूतकाल के प्रकृतिगत विभेदन से स्पष्टतः फरक बात नजर आवता बा । अउरी वाक्य (घ) में प्रयुक्त क्रिया वाक्य (ङ) के साथ विभेदकता स्पष्ट देखावत बाः

  1. कपड़ा नीमन हो गइल।

एकर आशय ई ह कि पहिले ‘‘कपड़ा नीमन ना रहे, अब हो गइल’’। अतः एह से अवस्थान्तरण भा क्रमण के बोध होता । बाकिर वाक्य (घ) के ओह तरे से नइखे अर्थ लगावल जा सकता। ‘‘कपड़ा नीमन रहे’’ कहला के आशय इहे ह कि कपड़ा के नीमन अवस्था पूर्णतः अपरिवर्तित रहल बा। एह तरे अवस्थावत विचलन भा अवस्थान्तरण के बोध ना भइल ही अवस्थितिक क्रिया के मूल आधार बनल बा।

परिचयात्मक अवस्था के बोध करवला से च-छ वाक्यन में भी अवस्थितिक क्रिया के संलग्नता नजर आ रहल बाः

  1. विमल शिक्षक ह।
  2. पंद्रह गते (तारीख) शुक्रवार ह।

एह वाक्यन में विमल में शिक्षक के आ पंद्रह गते (तारीख) में शुक्रवार के परिचायक सत्ता स्थापित बा। अर्थात् विमल शिक्षक के रूप में आ पंद्रह गते (तारीख) शुक्रवार के रूप में विशेषित भइल बाड़े स। एह तरे के विशेषक शब्द खास व्यक्ति भा धारणा में आपन सत्ता संदर्भित कइले बाड़े स, कवनो घटना भा विघटन के बोध नइखे करवले स। उक्त अवस्थिति के बोध करावे खातिर ‘‘ह’’ क्रिया वाक्यात्मक तह में सहायक मात्र भइल बा।

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प्रक्रमण अवस्थान्तरण से संबद्ध अभिलक्षण भइला से अवस्थितिक क्रिया के प्रक्रमण बोधक ‘‘ले’’ प्रत्यय के प्रयोग नजर ना आवे चाहे अइसन क्रिया में ‘‘ले’’ प्रत्यय नजर अइलो पर एकनी से प्रक्रमणता भा विचलन ना होखेः

  1. झोरा में किताब बड़ले बा।
  2. हरि शिक्षक हइले ह।

वाक्य ज-झ में प्रयुक्त ‘‘ले’’ कार्य के प्रक्रमणता व्यक्त करे खातिर ना, बल्कि कार्यावस्था के निश्चिति भा जोड़ देवे खातिर भइला से उक्त स्थिति में अवस्था के अवन्तरण भा विचलन पता लगावल संभव नइखे। एही तरे का बा, का ह, के ह भा का रहे, के रहे जइसन प्रश्न के उत्तर में आवेवाला क्रिया में भी अवस्थिति के अभिलक्षण खोजल जा सकत बा, बाकिर का होई, का भइल, के होई, के भइल जइसन प्रश्न के उत्तर में अवस्थिति के संभावना ना रहेला।

२.२ प्रक्रिया

            कार्य के अवस्थान्तरण के बोध करावेवाला क्रियन के प्रक्रियात्मक मानल जाला (चेफ, १९७०, १००)। अइसन क्रियन से कार्यानुगमन भा अनुक्रमण के बोध होला। कार्य के घटन, विघटन के क्रम में अइसन क्रियन के साथ अन्वित होखेवाला नामिक पद सब कार्यानुवर्ती होले स चाहे नामिक पद सब क्रियाद्वारा अभिहित कार्य के पीछा करे के स्थिति में रहेले स, नियमन करे के स्थिति में ना रहे स। प्रक्रियात्मक क्रिया के निम्नलिखित पाँच वर्ग में राखल जा सकत बाः (क) प्रवर्तन, (ख) परिणमन, (ग) अप्रभावन, (घ) अनुप्रापण आ (ङ) अनुभवन।

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२.२.(क) प्रवर्तनः दृष्ट असर, अपचय, परिवर्तन भा परिवर्धन दर्शावेवाला प्रकियात्मक कार्य के एहिजा प्रवर्तन कहल गइल बा। जइसे-

            10-पानी खउल गइल।

            11- केंवाड़ी खुलल।

          12- मशीन चलल।

           13-शीशी फूटल।

वाक्य ञ-ड में पानी,  केंवाड़ी,  मशीन, शीशी क्रमशः खउले, खुले आ फूटे के अवस्था में प्रवर्तित भा परिवर्तित बाड़े स। अइसन क्रियन में अवस्थिति में भइल जइसन खास अवस्था विन्दु महत्त्वपूर्ण ना होके एक अवस्था विन्दु से दोसर अवस्था विन्दु में पहुँचल महत्त्वपूर्ण होला। अवस्थितिक क्रिया सब खास अवस्था के अविचलित स्थिति से संबद्ध रहेले स। ओही से ओकनी में कार्यात्मक विचनल के अभाव रहेला बाकिर प्रक्रियात्मक में कवनो ना कवनो क्रमण भा अन्तरण निहित रहला से ओकनी में विचलन रहेला।

२.२.(ख) परिणमनः कार्य के प्रतिफलन जनावेवाला प्रक्रियात्मक कार्य के इहाँ परिणमन कहल गइल बा, जइसेः

           14- पौधा लागल।

            15-भात इन्हाइल।

वाक्य ढ-ण में लागल, इन्हाइल से क्रमशः पौधा आ भात में असर ना पड़के उक्त वस्तु परिवर्तन भइला तथा अस्तित्व में अइला नजर आवत बा। एह तरे परिणमन कार्य प्रतिफल जनावेला, खास वस्तु पर असर पड़ल बा, विकार भा संस्कार नइखे भइल। लागल आ इन्हाइल कार्य संपन्न होखे से पहिले पौधा आ भात के अस्तित्व उक्त संदर्भ में अस्वीकार्य बा बाकिर ञ-ड में खउलल, खुलल, चलल, फूटल जइसल क्रियन खातिर पानी, केंवाड़ी आदि के पहिले उपस्थिति आवश्यक होई। एह से प्रवर्तन आ परिमणन के बीच के भिन्नता स्पष्टतः प्रदर्शित होखी।

क्रिया के प्रक्रिया के विभिन्न अवस्था विन्दु होले सः आरंभ,  मध्य भा अंत्य। कवनो क्रिया खातिर आरंभ विन्दु ही महत्त्वपूर्ण होला। जइसे, देखल, समझल। कवनो उक्त विन्दु में ही उपयोगी हो सकेले स। जइसे, खुलल, खउलल। अइसन क्रिया के कार्य में प्रक्रमण तथा आवृत्ति संबंधी बात स्पष्टतः अभिलक्षति होले स। आ कवनो खाली क्रिया के अंत्य विन्दु में विशेष उपयोगी होले स। जइसे, जामल, पाकल। परिणमन स्वयं में क्रिया के प्रतिफल से संबंधित भइला से ई कार्य के विभिन्द विन्दुन में से अंत्य विन्दु के महत्त्वपूर्ण बनावेला, जवन स्वभाविक बा। एकरा खातिर अन्त्य विन्दु मात्र प्रत्यावर्ती विन्दु के रूप में रह सकत बा।

२.२.(ग) अप्रभावन

            कुछ क्रिया से नामिक पद के साथ कार्य के अनुगमन के बोध भइला के बादो प्रवर्तन भा परिणमन के बोध ना होखे। कार्य के सहभागी के रूप में आवेवाला नामिक पद के साथ ओकर असर भा परिणमन कुछो ना जनाके सामान्य अनुगमन मात्र जनावे वाला कार्य प्रकृति के अप्रभावन मानल गइल बा, जइसे़

           16- जाड़ा बितल।

            17-रास्ता कटल।

इहाँ जाड़ा के बितल आ रास्ता के कटल से अनुगमन के बोध हो रहल बा। काहेकि बितला से जाड़ा के (समय) अन्तरण आ कटला से रास्ता के (स्थान) अन्तरण के स्पष्टतः बोध हो रहल बा। बाकिर उक्त अन्तरण ना हजाड़ा ना रास्ता, कवनो के प्रभावित कइले बाड़े स।

नामिक पद संगे कार्य के प्रभाव के प्रदर्शन ना करे के, बाकिर अनुगमन के बोध भइला से अइसन कार्य के अप्रभावन कहल गइल बा।

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२.२ (घ) अनुप्रापणः चेतन सत्ता में भौतिक भा शारीरिक कार्य के दृष्ट भा अदृष्ट असर निहित होखेवाला प्रक्रियात्मक कार्य के अनुप्रापण मानल गइल बा, जइसे-

            18- राम गिरल।

          19- विमल नीन में फोंफ कटलस।

वाक्य द-ध में प्रयुक्त गिरल आ फोंफ कटला से भौतिक कार्य के बोध भइला के बादो एकनी के असर (जेमें प्राप्त होला, ओमें) स्थूल रूप में दृष्ट भइल अनिवार्य नइखे बाकिर अदृष्ट असर के ग्रहीता सहभागी हमेशा सजीव ही रहेला। वस्तुतः अनुप्रापण कार्य भौतिक संघटन, विघटन तथा घर्षण से संबद्ध असर के चेतनधर्मी ग्रहणशीलता से संबंधित दिखाई देलाः

            20- साँप हरि के डंसलस।

            21-रमेश भाई के पिटलस।

            22- विमल मछरी पकड़लस।

वाक्य न-फ में अनुप्रापण प्रक्रिया अभिकार्य से अन्वित भइल नजर आवता। डंसल, पिटल, पकड़ल से खाली अभिकार्य ही बल्कि अनुप्रापण के भी बोध होखत बा। काहेकि एह क्रियन से भौतिक असर के भी बोध होखत बा। उक्त असर इहाँ संघटन भा घर्षण क्रिया के माध्यम से हरि, भाई आ मछरी जइसन सजीवन नामिक पद से व्यक्त भइल बा। ओही से चेतनधर्मी कार्य के ग्रहणशीलता अनुप्रापण में निहित भइल नजर आवत बा।

अनुप्रापण चेतनधर्मी भइला से एकरा से प्रवर्तन भा अप्रभावन तक के अपना संगे समाहित कइले रहेलाः

            23- हरि के पत्थर लागल।

           24- रमेश के रोग बढ़ गइल।

वाक्य ब-भ में हरि से अनुप्रापण आ पत्थर से प्रवर्तन तक के बोध होखत बा। वाक्य भ में रमेश रोग से प्रभावित भइलो पर रोग स्वयं बढ़ला से अप्रभावित भइला से अप्रभावन के बोध हो रहल बा।

२.२ (ङ) अनुभवनः मानसिक अनुभूति से संबद्ध प्रक्रियात्मक कार्य के अनुभवन मानल गइल बा। हैलिडे एकरा के मानसिक प्रक्रिया के अंतर्गत मनले बाड़े (१९८५, १०७-८)। अवस्थिति आ प्रक्रिया क्रिया के दूगो विभेदक अभिलक्षण रहला से एकनीका विपरीत प्रकृति के भी होले स। अतः खास क्रिया में एगो के रहला पर सामान्यतः दोसर के उपस्थिति ना होखे। बाकिर अनुभवन अइसन प्रकार्य ह जेमें अवस्थिति केप्रति भी कुछ ना कुछ झुकाव रहेला। अनुभवन से संबद्ध क्रिया सब एह दृष्टि से अन्य क्रिया से अलग तरह के होले स। जइसे-

    (म)

25-हरि हिसाब जानेला।

26-हरि हिसाब जनले बा।

27-हरि के हिसाब मालूम रहेला।

(य)

28-हरि पैसा चाहेला।

29-हरि के पैसा के जरूरी रहेला।

30-हरि के पैसा के जरूरी बा।

(र)

31-हरि पाठ इयाद रखेला।

32-हरि पाठ इयाद रखले बा।

33-हरि पाठ इयाद कइले रहेला।

जानल, चाहल, इयाद राखल क्रियन से संबद्ध उपर्युक्त म-र वाक्यन के खास-खास स्थिति में एक दोसरा के पर्यायवाची भा शब्दान्तर के रूप में देखावल जा सकत बा। मानसिक क्रियन के चेतन के मनःस्थिति भा मनोदशा के द्योतक होले स, जइसे-

           34- ओकरा डर बा।

          35- ओकरा में डर बा।

               36- ऊ डेराला।

           37- तोहर का चाहना बा?

               38- तोहरा में का चाहना बा?

              39- तू का चाहताड़ऽ?

उपर्युक्त वाक्य से भी अनुभवन के साथ के स्थिति के बोध हो रहल बा । स्थितिबोधकता अवस्थितिक क्रिया में निहित होखेवाला मूल अभिलक्षण के रूप में नजर आवत बा,बाकिर ऊ ल-व के वाक्यन में भी निहित रहला से अनुभवन में अवस्थिति के रहल स्वाभाविक बा।

निष्कर्ष

            निष्कर्ष के रूप में ई कहल जा सकत बा कि कवनो घटन-विघटन के बोध ना करावेवाला क्रिया में अवस्थिति मिलेला। अइसन क्रिया सब अवस्था प्रधान भइला के कारण प्रक्रमण बोधक तथा अपूर्णता बोधक ना होले स। ‘अवस्थान्तरण ना भइल’ के उक्त क्रियन के मूल विशेषता के रूप में प्रयुक्त कइल जा सकत बा। प्रक्रियात्मक क्रियन में अवस्थान्तरण निहित होला (अधिकारीः वि.सं.२०५२, पृ.सं.५०)। ओही से कार्य के घटन-विघटन तथा कार्यानुगमन के बोधगम्यता  एह तरे के क्रियन में अपेक्षित मानल जाला। अपचय, परिवर्तन भा परिवर्धन के कारण असर के बोध करावेवाला प्रकृति के क्रिया के प्रवर्तन कहल जा सकत बा, आ प्रतिफल जनावेवाला क्रिया सब में परिमणन दिखाई देवेला। ओही से ‘‘पानी खउल गइल’ में प्रवर्तन आ ‘‘भात इन्हाइल’ में परिणमन के अभिव्यक्त के देखल जा सकत बा। अप्रभावन में प्रवर्तन, परिणमन आदि कुछ के उपस्थिति ना होके सामान्य प्रक्रियात्मकता भा अनुगामिता मात्र के उपस्थिति पावल जाला। एह तरे अप्रभावन में क्रिया के अवस्थान्तरण निहित भइलो पर ओकरा में सहभागी कार्य के असर ना दिखाई पड़े। अनुप्रापण में प्रवर्तन, परिमणन जइसन भौतिक असर के दृष्ट भइल जरूरी ना होखे। अनुप्रापण से चेतनधर्मी संदर्भ में दिखाई देवेवाला आ कबोकाल्ह के प्रवर्तन तथा अप्रभावन तक के अन्वित कइला से प्रक्रिया के अन्य कार्य प्रकृति से अलग पहचान प्रदर्शित होला। अनुभवन में त मानसिक प्रक्रिया स्पष्टतः संलग्न रहेला। मनःस्थिति बोधक भइला के कारण ई अन्य प्रक्रियात्मक क्रियन में कुछ अलग दिखाई देवेला। अइसन स्थिति में क्रिया के कार्य प्रकृति के ढाँचा ही अभिकार्य-प्रक्रियात्मक बनेवाला हो जाला। एह तरे अभिकार्य-प्रक्रियात्मक ढाँचा के क्रियन के स्थिति सामान्यतः तीन प्रकार के नजर आवेला- अभिकार्याभिमुखी, मध्यवर्ती आ प्रक्रियामुखी। ओह में इन्तजार कइल, पढ़ल जइसन क्रिया अभिकार्याभिमुखिता, पिटल आ खेदल जइसन मध्यवर्तिता आ गिरावल, रोकल जइसन प्रक्रियाभिमुखिता के दर्शावेला।

संदर्भग्रंथ सूची

अधिकारी, हेमांग राज (वि.सं. २०४९), समसामयिक नेपाली व्याकरण, लेखक स्वयं, कुञ्जल प्रकाशन।

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अश्क, गोपाल आ डॉ. विश्वम्भर कुमार शर्मा (वि.सं. २०७७), भाषा र भोजपुरी भाषा, काठमांडूः ऐरावती प्रकाशन प्रा.लि.।

चेफ, डब्ल्यु. एल. (१९७० सन्), मिनिंग एन्ड द स्ट्रक्चर अफ लैंग्वेज, सिकागोः सिकागो युनिवर्सिटी प्रेस।

लैकोफ, जर्ज (१९७० सन्), इरेगुलारिटी इन सेन्टैक्स, न्यूयोर्कः होल्ट, रिनेहार्ट एन्ड विन्स्टन।

2 COMMENTS

  1. भोजपुरी उ व्याकरण पर गंभीर अउर प्रमाण सहित आलेख बहुत
    काम के बाऽ

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