‘बात-बतकही’ में दिखता भोजपुरी समीक्षा का विकसित स्वरूप

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डॉ. सुनील कुमार पाठक

भोजपुरी साहित्य के सुपरिचित हस्ताक्षर कनक किशोर जी की लेखनी ने गद्य-पद्य दोनों विधाओं में धूम मचा रखी है। ऐसा नहीं कि इस रेलारेली में कुछ भी पका-अधपका वे परोसते जा रहे हैं, यही तो उनकी खूबी है कि वे जो कुछ भोजपुरी के लिए कर रहे हैं, वह पूरी तरह सुनियोजित और सार्थक तरीके से सोच-विचार कर अंजाम दे रहे हैं। वे भोजपुरी में स्वयं लिखकर तो उसे समृद्ध कर ही रहे हैं, विद्वान लेखकों और कवियों से लिखवा कर भी उसे अपनी किताब और पत्रिका में संपादित कर स्थान दे रहे हैं। खासकर नारी-विमर्श को लेकर उनके द्वारा संपादित कविता संग्रह ‘कठपुतरी’, भोजपुरी किसानी कविताओं को लेकर उनके द्वारा संपादित कृति ‘भोजपुरी के किसान कविता’, भोजपुरी आत्मकथात्मक आलेखों पर आधारित उनके द्वारा संपादित कृति ‘रामकहानी – आपन-आपन’ तथा ‘आलोचना के चौपाल’ (दो भाग) तो बेहद चर्चित रहे ही हैं, इनके अतिरिक्त कन्हैया प्रसाद सिंह ‘आरोही’ रचनावली का संपादन भी भोजपुरी को उनका उत्कृष्ट अवदान है। उनके द्वारा हिन्दी समीक्षात्मक आलेखों के संग्रह ‘भोजपुरी – शब्द एवं संवेदना’ का संपादन भी बहुचर्चित रहा है।

अभी बात मैं उनके सद्यःप्रकाशित समीक्षात्मक आलेखों के संग्रह ‘बात-बतकही’ की करना चाहता हूँ। नर्मदा प्रकाशन, भोपाल से प्रकाशित इस कृति में कनक जी के कुल 15 समीक्षात्मक आलेख शामिल हैं। कनक जी की इस कृति का शुरुआती आलेख भोजपुरी के लब्धप्रतिष्ठ कवि प्रकाश उदय जी की कविताओं पर आधारित है, जिसमें कनक जी प्रकाश उदय की कविताओं को ‘लीक से हटकर एक नयी ताजगी भरा अनुभव’ बताते हैं। इसी तरह इस किताब का दूसरा आलेख भोजपुरी समालोचना की कृति ‘भोजपुरी कविता : रुचि आ रचाव’ (सुनील कुमार पाठक) पर केन्द्रित है, जिसमें वे लिखते हैं – “पाठक जी द्वारा ऐतिहासिक परम्परा में तुलनात्मक दृष्टि से भोजपुरी कविता के विवेचना उनकी समीक्षकीय दृष्टि के मौलिकता, सारगर्भिता आ तार्किकता के परिचायक बा।”

इस कृति का तीसरा आलेख डॉ. गोपाल ठाकुर के कथा-संग्रह ‘लालपुर्जा’ पर एक समीक्षात्मक दृष्टि विक्षेपित करता है। यहाँ समीक्षक की स्थापना है कि “संकलित कथा सबके प्रतिरोध के मजबूत आवाज के रूप में देखल जा सकत बा।” कनक जी ने अपना चौथा आलेख जनवादी चिंतन और प्रतिरोध की संस्कृति से प्रभावित भोजपुरी के एक श्रेष्ठ कवि-नाटककार सुरेश काँटक जी की कविताओं के संग्रह ‘धरती के गीत’ की रचनाओं को विश्लेषित-विवेचित करते हुए प्रस्तुत किया है। इस पुस्तक का पाँचवाँ आलेख समीक्षक ने छोटे प्रसाद शाह तेली के कविता संग्रह ‘साह के आह’ की कविताओं पर बातें करता है। शिवेन्द्र नारायण सिंह की कृति ‘भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन आउर सारण’ की समीक्षा भी इस किताब में है, जिसके जरिए उक्त कृति का महत्व निरूपित किया गया है।

सुपरिचित कथा-लेखिका मीनाधर पाठक के हाल में ही छपे एक बहुचर्चित उपन्यास ‘नीमिया रे करुआइनि’ पर भी कनक किशोर जी ने एक शानदार समीक्षा लिखी है। वे मानते हैं कि इस औपन्यासिक सर्जना में कल्पना, भावुकता के साथ-साथ किस्सागोई भी भरपूर है, जो आत्यंतिक पाठकों को बाँधे रहती है।

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पुस्तक में भोजपुरी और हिन्दी के मँजे हुए गीतकार कमलेश राय जी के गीत-नवगीत संग्रह ‘हर समय में हँसे धरती’ के जरिये उनके गीतों की वैयक्तिक रागात्मकता के साथ-साथ सामाजिक प्रतिबद्धता को भी समीक्षक कनक किशोर जी ने रेखांकित किया है। हिन्दी और भोजपुरी के वरिष्ठ लेखक सूर्य देव पाठक ‘पराग’ की हाल ही में छपी ‘पराग सतसई’ को भी कनक जी ने पराग जी की काव्यकला के वैशिष्ट्य-विवेचन का आधार बनाया है। एक अन्य रचनाकार माया शर्मा के गीत संग्रह ‘जिनिगिया के थाती’ को भी अपने एक आलेख में समीक्षक ने अपना प्रतिपाद्य बनाया है।

इस समीक्षा कृति के एक आलेख में कनक जी ने डॉ. जितराम पाठक की कविताओं में समकालीनता-बोध को विवेचित किया है। हाल ही में छपी हिन्दी के सुख्यात कवि चंद्रेश्वर के प्रथम भोजपुरी कविता संग्रह ‘गोहार’ तथा नेपाल में भोजपुरी के महत्वपूर्ण साहित्यकार गोपाल अश्क के निबंध संग्रह ‘सूरज डूबे रे नदिया’ का समीक्षात्मक अध्ययन तथा रंजन प्रकाश के उपन्यास ‘रामेसर के चिट्ठी’ में कनक जी ने भोजपुरी उपन्यास के नये क्षितिज के विस्तार को देखा है।

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यह पूरी कृति समय-समय पर लिखे गये कनक किशोर जी के ही विश्लेषणपरक आलेखों का संग्रह है, फिर प्रत्येक आलेख के शीर्षक के साथ पृथक-पृथक कनक किशोर जी का नाम उल्लिखित होना अनपेक्षित है।

कनक जी की यह समीक्षा कृति ‘बात-बतकही’ भोजपुरी समीक्षा के आगे बढ़ते कदमों की ही निशानी है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए।

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