भोजपुरी के नाम पर फैल रहे फूहड़पन के विरुद्ध छेड़ा अभियान है ‘लोकरंग’

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अंतरराष्ट्रीय फलक पर लोकरंग की खुशबू, इसमें अब तक 1800 से अधिक लोक कलाकारों ने भाग लिया है तो गांव की महिलाओं ने परंपरागत लोकगीतों को अंतरराष्ट्रीय जगत तक पहुंचाया है। इस अभियान ने लगभग 150 लोक कलाकारों को प्रति वर्ष मंच प्रदान किया तो भव्यता और भित्ति चित्रों से पूरे गांव को सजाकर, एक सांस्कृतिक वातावरण का निर्माण भी किया।

दया शंकर राय, वरिष्ठ पत्रकार

करीब 35 साल पहले शुरू हुई उदारीकरण और वैश्वीकरण की अर्थव्यवस्था ने भारत में भी बहुत कुछ बदला है। अर्थव्यवस्था और राजनीति के संरचनागत ढांचे में ही नहीं, सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना की बुनावट में भी..! आवारा वित्तीय पूंजी ने जिस तरह अपना विस्तार किया है उसने अमीरी और गरीबी की खाई को बढ़ाने का भी काम किया और एक नए किस्म के निम्न मध्य वर्ग को भी जन्म दिया है और छोटा ही सही गांवों में भी निम्न मध्यम वर्ग के इस इस नवजात वर्ग को भी विस्तार मिला है।

बेशक शिक्षा की दृष्टि से गांवों की तस्वीर 50-60 साल पहले की तुलना में काफी बदली है। खासकर लड़कियों की शिक्षा में। लेकिन इस बदलाव का ज्यादा फायदा उसी तबके को मिला है जो पहले से अपेक्षाकृत सम्पन्न था। सरकारी स्कूल पहले की तुलना में विपन्न हुए हैं। 1990 के दशक से गांवों में सेंट बजरंगबली पब्लिक स्कूल खुलने लगे जहां नये सम्पन्न तबके के बच्चे जाने लगे लेकिन बाकी का बड़ा वर्ग बदहाल सरकारी स्कूलों पर निर्भर रहा। टीवी-मोबाइल की संचार क्रांति ने बहुत कुछ बदला लेकिन गांवों पर उसने लिप्सा और नकल की पतनशील संस्कृति के बीज भी बोये। उत्पादन के साधनों में आये बदलाव ने गांवों के सामाजिक सम्बन्धों को भी बहुत कुछ बदला और वहां की पारम्परिक सरोकार वाली सामाजिक संस्कृति भी एक किस्म की विलग़ाव का शिकार हुई। ऐसे में गांवों में सुलभ बना दी गई शराब की दुकानों ने बेरोजगार युवकों को एक नई किस्म की लंपट संस्कृति की ओर धकेला।

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महानगरों और शहरों में तो गोष्ठी-सेमिनार के जरिये कुछ बहस-मुहाहिसे के अवसर भी उपलब्ध हो जाया करते हैं पर गाँव इससे बिलकुल वंचित हैं। ऐसे में बाजार की हिंसक होड़ से जन्मी उपभोक्ता संस्कृति के अनेक अराजक और आवारा रूपों को गांवों में विस्तार मिलता गया और किसी नई शैक्षिक संस्कृति के अभाव में गांव अपनी पारम्परिक कला और सरोकार संस्कृति से भी जुदा होते गए। जबकि गांवों की जटिल वर्णाश्रमी समाज व्यवस्था को देखते हुए यह जरूरी था कि वहां बिलकुल नई किस्म की शैक्षणिक चुनौतियों के साथ आगे बढ़ा जाता जो एक मुश्किल चुनौतीपूर्ण और जटिल काम भी थी। जरूरत आगे बढ़कर कुछ लोगों के पहल लेने की थी। ऐसी ही एक कोशिश उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के फाजिलनगर के गाँव जोगिया जनूबी पट्टी में पिछले 19 साल से जारी है जिसने गांवों के लिए एक रास्ता दिखाया है और इसके सूत्रधार हैं लेखक और हाशिये के लोगों के इतिहासकार सुभाषचन्द्र कुशवाहा।

  आज से 18 वर्ष पहले बुद्ध की धरती कुशीनगर के गांव जोगिया जगुनी पट्टी की एक गंवई संस्था लोकरंग सांस्कृतिक समिति ने लोकसंस्कृतिकर्मियों को सामाजिक उन्नयन में सहभागी बनाते हुए भोजपुरी गीतों में पसर रही फूहड़पन की संस्कृति के विरुद्ध एक अभियान की शुरुआत की थी। आरकेस्ट्रा को नकारने और अपनी परंपरागत लोक संस्कृतियों को सहेजने की दिशा में प्रतिबद्ध इस संस्था ने सुभाष चन्द्र कुशवाहा के मार्गदर्शन में बिना किसी अकादमिक सहयोग के अपने शोधपरक कार्यों और गांव वालों के समर्पण और सहयोग से बहुत जल्द अंतरराष्ट्रीय छवि बना ली और देशभर की लोकसंस्कृतियों की प्रगतिशील प्रस्तुतियों को पूर्वांचल के गांव में उतार कर, सांस्कृतिक आदान-प्रदान की अनोखी मिसाल कायम की।

लोकरंग अभियान ने लोक संस्कृतियों और लोक कलाकारों का दस्तावेजीकरण भी शुरू किया। आजादी की लड़ाई के दिनों में चर्चित, पूर्वांचल के गुमनाम महान लोक कलाकार रसूल मियां की रचनाओं को तलाशने और उन पर शोध करने का कार्य लोकरंग सांस्कृतिक समिति ने किया। तमाम गुमनाम लोक कलाकारों के नाम पर लोकरंग आयोजनों को समर्पित कर उन्हें याद किया गया। नाच मास्टर रसूल मियां पर तैयार आलेख मौलिक दस्तावेज के रूप में इस्तेमाल होने शुरू हुए और इग्नू सहित कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल हुआ। इस अभियान ने लगभग 150 लोक कलाकारों को प्रति वर्ष मंच प्रदान किया तो भव्यता और भित्ति चित्रों से पूरे गांव को सजाकर, एक सांस्कृतिक वातावरण का निर्माण भी किया।

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इस अनूठे सांस्कृतिक अभियान की खबर जब महान लेखिका महाश्वेता देवी तक पहुंची तो उन्होंने 2010 में अपना लिखित संदेश भिजवाया था। राज्यसभा टीवी तक जब खबर पहुंची तो उन्होंने इस कार्यक्रम को लगातार पांच सालों तक न केवल प्रसारित किया बल्कि अनेक डॉक्यूमेंट्री बनाई। इस आयोजन की शोहरत ने विदेशों में बसे गिरमिटिया कलाकारों को भी प्रभावित किया और 2017 में पहली बार सूरीनाम और नीदरलैंड के जाने-माने सरनामी भोजपुरी गायक राजमोहन, नीदरलैंड सरकार के सहयोग से लोक कलाकारों की टीम लेकर जोगिया जनूबी पट्टी आये। तब से वे 6 बार इस आयोजन में शिरकत कर चुके हैं। 17 सितम्बर, 2018 को उन्होंने नीदरलैंड के उट्रेच शहर में लोकरंग अभियान के प्रचार और सहयोग के लिए एक कंसर्ट भी आयोजित किया था।

लोकरंग सांस्कृतिक समिति की गतिविधियां ⁠www.lokrang.in⁠ की वेब साइट के माध्यम से पूरी दुनिया में देखी और जानी-समझी जाने लगीं। ‘लोकरंग 2019’ में दक्षिणी अमेरिकी देश, गयाना और न्यूजर्सी से भोजपुरी गायक एस्टान रम्दहल अपनी टीम के साथ खुद के खर्च पर आये। एस्टान, जन्म से अमेरिकी नागरिक हैं और उनके पूर्वज 6 पीढ़ी पहले गयाना ले जाये गये थे जो तब ब्रिटिश उपनिवेश था। वे अपने परदादा की हताश गायकी’ को, बिहार से गयाना में जिंदा रखे हुए हैं। इसी तरह मारीशस से सरिता बुद्ध, जो मारीशस के पूर्व उप प्रधानमंत्री की पत्नी भी हैं और मारीशस की भोजपुरी स्पीकिंग यूनियन, मिनिस्ट्री ऑफ आर्ट एण्ड कल्चर की अध्यक्ष हैं, 2019 में 27 सदस्यीय हॉर्मोनी गवाईं टीम के साथ इस कार्यक्रम में आईं और सारा खर्च मारीशस सरकार ने उठाया। गीत गवाईं टीम को यूनेस्को ने वर्ल्ड हेरीटेज में शामिल कर रखा है। वर्ष 2019 में लोकरंग, को गिरमिटिया महोत्सव के रूप में आयोजित किया गया था। डरबन, दक्षिण अफ्रीका के केम चांदलाल ने दो बार लोकरंग में शिरकत की है। लोकरंग ने अपने प्रयास से विदेशों में फैले गिरमिटिया कलाकारों को तलाश कर उन्हें इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि वे पूर्वांचल की धरती पर एक बार जरूर आयें। यह भी उल्लेखनीय है कि ज्यादातर गिरमिटिया, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार से ही गये थे। इसलिए, लोकरंग में शामिल होने के लिए वे उत्सुक भी दिखे।

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लोकरंग अभियान ने गांव में विचार गोष्ठी आयोजित करने और उनमें प्रो. मैनेजर पाण्डेय, प्रो. केदारनाथ सिंह, प्रो. गोरेलाल चन्देल, प्रो. रविभूषण, प्रो. राजेन्द्र सिंह, प्रो. चौथीराम प्रो. रामपुनियानी, आनंद स्वरूप वर्मा, प्रेम कुमार मणि, प्रो. सदानंद शाही, पंकज बिष्ट, प्रो. शंभु गुप्त, प्रोफेसर गौहर रजा, दिनेश कुशवाहा, प्रोफेसर सुभाष चंद्र सैनी आदि भाग ले चुके हैं। इस अभियान में अब तक 1800 से अधिक लोक कलाकारों ने भाग लिया है तो गांव की महिलाओं ने परंपरागत लोकगीतों को अंतरराष्ट्रीय जगत तक पहुंचाया है।

आज कुशीनगर के लोकरंग कार्यक्रम के बारे में पूरी दुनिया में जानकारी उपलब्ध है और गूगल, चैट जीपीटी, डीपसीक, ग्रोक आदि ए.आई. प्लेटफार्म से लोकरंग के बारे में जाना जा सकता है।
ध्यातव्य है कि इस अभियान ने गांव के युवाओं, आसपास के लोक कलाकारों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के सहयोग से अपसंस्कृति से समाज को बचाने का प्रयास किया है तो परंपरागत लोक संस्कृतियों के संरक्षण और संवर्द्धन का काम भी किया है। गोरखनाथ की जोगी गायकी, कबीर के निर्गुन और बुद्ध के आत्मवाद के प्रसार के साथ क्षेत्र और आसपास के लोक कलाकारों की याद में इस आयोजन को मनाए जाने की परंपरा ने भी लोक कलाकारों के प्रति अपनी वचनबद्धता को पूरा किया है।

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इस बार 11-12 अप्रैल को लोकरंग 2026 का उद्घाटन लेखक और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुभाष चंद्र सैनी ने किया । इस बार की गोष्ठी का विषय था ‘हाशिए के समाज की संस्कृति और उसके नायक’ जिसमें देश के काई महत्वपूर्ण लेखकों, बुद्धिजीवियों और पत्रकारों ने भाग लिया। त्रिपुरा, झारखंड, छत्तीसगढ़, बुंदेलखंड, बनारस और असम की पारंम्परिक नृत्य और नाट्य टीमों ने 11और 12 अप्रैल की रात को अपनी यादगार और मनोहारी कार्यक्रमों से सांस्कृतिक वैविध्य के कई सृजनात्मक रंग बिखेरे।

विश्व पटल पर छा गए लोकरंग के इस आयोजन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह भी रही है कि इसने इस आयोजन से जुड़े गाँव के युवाओं को मसखरेपन और पतनशील व लंपटता की संस्कृति से बचाया है और शायद गांवों को बचाने और उन्हें सही अर्थों में समृद्धि की ओर ले जाने की जमीन तैयार करने में ऐसे आयोजन नवजागरण की एक नई जमीन भी प्रदान करते हैं। ऐसे आयोजन हर जिले के कुछ गाँवों में जरूरी होते हैं पर इसके लिए सबसे जरूरी है सुभाष चन्द्र कुशवाहा जैसी पहल की जिन्होंने बहुत कुछ अपने निजी प्रयासों और कल्पनाशीलता से लोकरंग को इस मुकाम पर लाकर खड़ा किया है जहां से वह अपसंस्कृति के बरक्स सृजनशील लोक और जनसंस्कृति के विविध रंगी रूपों के अन्वेषण और संवर्धन की नजीर बन रास्ता दिखाने का भी काम कर रहा है।

दरअसल सुभाष चंद्र कुशवाहा ने 19 साल पहले जो पहल की थी उसने अब एक दिशा पकड़ ली है और उनकी यह पहल उल्लेखनीय इसलिए कही जाएगी क्योंकि शराब की खुलती दुकानों ने गांवों के बेरोजगार युवकों को जिस तरह नशे की ओर धकेल दिया है उसमें लोकरंग से जुड़ी इस जोगिया गाँव की टीम के युवा न सिर्फ नशे से दूर हैं बल्कि वे लोक संस्कृति और फूहड़ संस्कृति का फर्क भी बखूबी समझने लगे हैं। बेरोज़गारी बेशक उनके सामने भी वैसे ही है पर जिस समझदारी भरी लगन से यह टीम लोकरंग को जमीन पर उतारती है वह एक मिसाल है। जाहिर है इसमें सुभाष कुशवाहा का मार्गदर्शन अहम रहा है। लेकिन पहल तो किसी न किसी को लेनी पड़ती ही है।

आज शहरों से भी ज्यादा जरूरी है कि ऐसे आयोजन गांवों, कस्बों और छोटे जिलों में हों। लखनऊ, इलाहाबाद, भोपाल जैसे शहरों में तो फिर भी कुछ साहित्यिक सांस्कृतिक और वैचारिक आयोजन हो जाया करते हैं जिससे एक वैचारिक हलचल और बहस मुबाहिसे के मंच उपलब्ध हो जाया करते हैं। पर ज्यादातर गांव तो इससे अछूते ही हैं। जबकि जरूरत इस बात की है कि हर किस्म के पिछड़ेपन और वैचारिक कूपमण्डूकता और जड़ता के खिलाफ आधुनिकता पर आधारित मूल्यों और विचारों के उन्नयन और विचार – विमर्श के लिए गांवों में संस्कृति , कला और विचार के ज्यादा से ज्यादा मंच बनें। लोकरंग का यह सफर इस दिशा में एक रास्ता दिखाता है । इसलिए अगर लोकरंग में शामिल टीमें और साथी इस दिशा में पहल करते हैं तो यह बेहद मानीखेज होगा और लोकरंग का यह विस्तार एक नया रंग लाएगा। इससे बहुत कुछ न सही , कुछ कुछ तो समृद्ध होगा ही जो आगे चलकर बहुत कुछ की जमीन तैयार करेगा।

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