भोजपुरी भाषा का गौरवशाली इतिहास शुरू होता है मगध प्राकृत से

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1300 साल से अधिक पुरानी भाषा होने का गौरव भी है भोजपुरी को

पटना/गोरखपुर: ‘बिदेसिया बाबा, हमार देश छोड़ के कहां चले…’। भिखारी ठाकुर की यह पंक्ति आज भी गल्फ के मजदूर कैंपों से लेकर ट्रिनिडाड के कैरेबियन द्वीपों तक गूंजती है। भोजपुरी भाषा सिर्फ बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि मगध साम्राज्य की प्राचीन विरासत, किसानों की मेहनत, स्त्रियों की विरह पीड़ा और लाखों प्रवासियों की कहानी है। पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बिहार, झारखंड और नेपाल के तराई क्षेत्र में बोली जाने वाली यह भाषा आज दुनिया भर में 20 करोड़ से ज्यादा लोगों की पहचान है। 2011 की भारतीय जनगणना के अनुसार भारत में इसके 5.05 करोड़ मूल वक्ता हैं, जबकि एथनोलॉग के अनुसार विश्व स्तर पर इससे बहुत ज्यादा लोग हैं। यह आंकड़ा आंशिक है, क्योंकि कई जगह इसे हिंदी की बोली मानकर गिना जाता है।

मगध प्राकृत से विकसित हुई थी भोजपुरी
भोजपुरी भाषा का इतिहास मगध प्राकृत से शुरू होता है। यह इंडो-आर्यन भाषा परिवार की पूर्वी शाखा (ईस्टर्न इंडो-आर्यन) का हिस्सा है और बिहारी भाषा समूह (मैथिली, मगही के साथ) में आती है। विद्वानों के अनुसार यह मगध प्राकृत से विकसित हुई, जो मगध साम्राज्य (आधुनिक बिहार) के समय की राजभाषा थी। बाणभट्ट ने अपने ग्रंथ ‘हर्षचरित’ में स्थानीय भाषा का उल्लेख किया है। भाषाविद् जॉर्ज अब्राहम ग्रीअरसन ने इसे ‘एक व्यावहारिक भाषा, जो एक ऊर्जावान जाति की है’ कहा।

प्रारंभिक काल (700-1100 ई.) : मगध प्राकृत से उदय
भोजपुरी का जन्म मगध प्राकृत के अपभ्रंश चरण से हुआ। लगभग 700-1100 ई. के बीच यह अलग भाषा के रूप में उभरी। कुछ विद्वान सिद्ध साहित्य (8वीं शताब्दी) को भोजपुरी साहित्य का प्रारंभ मानते हैं, हालांकि यह विवादास्पद है। इस काल में लोककथाएं जैसे लोरिकायन (वीर लोरिक की गाथा), सोरठी बिरजाभ, विजयमाल, गोपीचंद और राजा भरथरी की कहानियां लोकप्रिय हुईं। नाम ‘भोजपुरी’ राजा भोज के वंशजों से जुड़ा है, जिन्होंने 12वीं शताब्दी के बाद भोजपुर क्षेत्र पर शासन किया। 1789 में ‘सीर मुताखेरिन’ के अनुवाद में सबसे पहले ‘बोधजपूरिया’ शब्द दर्ज है।

1100-1400 ई. के बीच भाषा ने अपना स्वरूप पाया। नाथ संतों की रचनाएं और लोकगीत फले-फूले। क्षेत्रीय सीमाएं तय हुईं।

संत काल (1400-1700 ई.), भक्ति और लोकगीतों का युग
इस युग में कबीर, धरनीदास, किना राम और दरिया साहेब जैसे संतों ने भोजपुरी में भक्ति रचनाएं दीं। कबीर की पंक्ति ‘कवन ठगवा नगरिया लूटल हो’ शुद्ध भोजपुरी है। फिर धीरे धीरे इसमें अरबी-फारसी शब्दों का भी प्रवेश हुआ। लोकगीत सोहर, कजरी, बिरहा, बारहमासा आदि इस भाषा की आत्मा बने। ये गीत मौखिक परंपरा में जीवित रहे।

ब्रिटिश काल (1700-1900 ई.) : शोध और वैश्विक प्रसार
1728 का एक दस्तावेज (कैथी लिपि में) भोजपुर के राजा होरील सिंह का है, जिसमें ‘सुवंसा पांडे…’ लिखा है। 1838-1917 के बीच ब्रिटिश इंडेंटर्ड लेबर सिस्टम के तहत लाखों भोजपुरी बोलने वाले मजदूर मॉरीशस (4.53 लाख), फिजी (60,000+), ट्रिनिडाड (1.43 लाख), गुयाना, सूरिनाम और दक्षिण अफ्रीका भेजे गए। इससे भोजपुरी फिजी हिंदी, सरनामी और कैरेबियन हिंदुस्तानी में विकसित हुई। चटनी म्यूजिक (भोजपुरी लोक + कैरेबियन बीट) का जन्म हुआ।
ब्रिटिश विद्वानों ने अध्ययन शुरू किया। जॉन बीम्स ने 1868 में पहला भोजपुरी व्याकरण प्रकाशित किया। ग्रीअरसन ने 1884 में लोकगीत संकलित किए और भाषा सर्वेक्षण में इसे ‘व्यावहारिक भाषा’ बताया।

आधुनिक काल (1900 से अब तक), साहित्य, सिनेमा और डिजिटल युग
20वीं शताब्दी में भिखारी ठाकुर (1887-1971) ने भोजपुरी को नाट्य और साहित्य का नया रूप दिया। उन्हें ‘भोजपुरी का शेक्सपियर’ कहा जाता है। 1917 में लिखा नाटक ‘बिदेसिया’ माइग्रेशन, स्त्री शोषण और जातिवाद की मार्मिक कहानी है। उनके अन्य नाटक बेटी बेचवा, गबरघिचोर आदि आज भी मंचित होते हैं।
1956 में रामनाथ पांडे का उपन्यास ‘बिंदिया’ भोजपुरी का पहला उपन्यास बना। 1962 में पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ैबो’ रिलीज हुई। 1915 में पहला अखबार ‘बगसर समाचार’ निकला। 1960-70 के दशक में पत्रकारिता फली। आज भोजपुरी विकिपीडिया (2003), गूगल ट्रांसलेट (2022) और यूट्यूब पर करोड़ों व्यूज हैं।
भोजपुरी को झारखंड में द्वितीय भाषा का दर्जा (2018) मिला है। बिहार, दिल्ली और मध्य प्रदेश में भोजपुरी अकादमियां सक्रिय हैं। यूनेस्को ने इसे ‘संभावित संकटग्रस्त’ भाषा सूची में रखा है, क्योंकि हिंदी का प्रभाव बढ़ रहा है।
वर्तमान स्थिति और आंकड़े
2011 जनगणना अनुसार भारत में 5 करोड़ से अधिक मूल वक्ता है जो अब तक करीब 10 करोड़ से अधिक हो गए होंगे। यूपी के पूर्वांचल और बिहार के पश्चिमी जिलों (भोजपुर, सारण, सीवान आदि) में मुख्य रूप से बोली जाती है। नेपाल के तराई में भी। प्रवास के कारण मॉरीशस, फिजी, सूरिनाम, ट्रिनिडाड में लाखों बोलने वाले। कुल वैश्विक संख्या भी करीब 10 करोड़ से ज्यादा ही है। भोजपुरी की लिपि पहले कैथी थी जो अब देवनागरी हो गई है। इसमें 4 मुख्य बोली उत्तरी, पश्चिमी, दक्षिणी और नागपुरिया है।

विरासत को बचाने का समय
भोजपुरी भाषा मिट्टी की खुशबू, संघर्ष और संस्कृति का प्रतीक है। मगध प्राकृत से शुरू हुई यह यात्रा आज वैश्विक हो चुकी है। स्कूलों में पाठ्यक्रम, डिजिटल प्लेटफॉर्म और अकादमियों के जरिए इसे मजबूत करने की जरूरत है। जब तक बिदेसिया की तान गूंजती रहेगी, भोजपुरी की पहचान जिंदा रहेगी।

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