भोजपुरी, मगही और अंगिका जैसे विषयों के NET में शामिल नहीं होने से पी-एच.डी. के इच्छुक अभ्यर्थियों के सामने संकट, सरकार से वैकल्पिक परीक्षा व्यवस्था की मांग
पटना। भोजपुरी भाषा और साहित्य को राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (NET) में शामिल नहीं किए जाने को लेकर बिहार में सवाल उठने लगे हैं। भोजपुरी, मगही और अंगिका जैसे विषयों में उच्च शिक्षा और शोध करने वाले विद्यार्थियों के सामने अब पी-एच.डी. में प्रवेश का रास्ता मुश्किल होने का दावा किया गया है। इस मुद्दे को लेकर बिहार के राज्यपाल से हस्तक्षेप की मांग की गई है।
मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि बिहार के कई विश्वविद्यालयों में लंबे समय से भोजपुरी भाषा के माध्यम से लोक साहित्य, भाषा और साहित्य के विभिन्न विषयों पर शोध होता रहा है। पत्र के अनुसार वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा, बीआरए बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर और जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा में लगभग 1995 से भोजपुरी के विद्यार्थी पी-एच.डी. करते रहे हैं।
एडमिशन टेस्ट बंद, NET स्कोर बना आधार
पत्र में कहा गया है कि पहले पी-एच.डी. में प्रवेश के लिए विश्वविद्यालयों में पी-एच.डी. एडमिशन टेस्ट की व्यवस्था थी, लेकिन अब इस पर रोक लगाकर NET स्कोरिंग को आधार बनाया गया है। समस्या यह है कि भोजपुरी, मगही और अंगिका जैसे विषयों को NET में शामिल नहीं किया गया है। ऐसे में इन विषयों से पी-एच.डी. करने की इच्छा रखने वाले अभ्यर्थियों के सामने रास्ता सीमित हो गया है।
पत्र में इसे लेकर साफ तौर पर कहा गया है कि इससे सैकड़ों अभ्यर्थी निराशा की स्थिति में हैं और अध्यापन के क्षेत्र में जाने की उनकी इच्छा प्रभावित हो रही है।
सवाल: भोजपुरी पढ़े विद्यार्थी जाएं तो जाएं कहां?
यही वह सवाल है जो इस पूरे मामले को राजनीतिक और शैक्षणिक बहस का मुद्दा बना सकता है।
जब विश्वविद्यालयों में भोजपुरी में स्नातकोत्तर और पी-एच.डी. की पढ़ाई होती रही है, शोध भी होते रहे हैं और भोजपुरी अध्ययन के लिए संस्थागत व्यवस्था मौजूद है, तो फिर पी-एच.डी. प्रवेश की नई व्यवस्था में भोजपुरी के विद्यार्थियों के लिए समान अवसर क्यों नहीं है?
बिहार से राज्यपाल को भेजे गए पत्र में मांग की गई है कि सरकार विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) से भोजपुरी समेत वंचित भाषाई विषयों को NET में शामिल करने की अनुशंसा करे।
BHU में भोजपुरी पर हो रहा शोध, फिर बिहार में अड़चन क्यों?
पत्र में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि वहां भोजपुरी अध्ययन केन्द्र भोजपुरी और हिन्दी माध्यम से भोजपुरी से संबंधित विषयों पर पी-एच.डी. के लिए शोध करवाता रहा है।
ऐसे में सवाल और बड़ा हो जाता है-जब देश का एक केंद्रीय विश्वविद्यालय भोजपुरी में उच्चस्तरीय शोध की व्यवस्था चला सकता है, तो भोजपुरी विषय के शोधार्थियों के लिए NET में रास्ता क्यों नहीं बनाया जा रहा?
NET में जगह मिलने तक वैकल्पिक व्यवस्था की मांग
मामले में तत्काल समाधान के तौर पर बिहार के विश्वविद्यालयों में भोजपुरी और अन्य प्रभावित भाषाई विषयों के पी-एच.डी. अभ्यर्थियों के लिए वैकल्पिक परीक्षा व्यवस्था लागू करने की मांग की गई है। पत्र में कहा गया है कि जब तक NET में भोजपुरी या अन्य भाषाओं को शामिल नहीं किया जाता, तब तक ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए।
भोजपुरी के साथ न्याय कब?
भोजपुरी करोड़ों लोगों की भाषा है और बिहार के विश्वविद्यालयों में वर्षों से इसके अध्ययन और शोध की परंपरा रही है। ऐसे में NET की मौजूदा व्यवस्था में भोजपुरी के लिए रास्ता नहीं होना सिर्फ परीक्षा का तकनीकी सवाल नहीं, बल्कि भाषाई विषयों के विद्यार्थियों के उच्च शिक्षा के अवसर का सवाल बन गया है।
अब देखना होगा कि बिहार सरकार और UGC भोजपुरी, मगही और अंगिका के विद्यार्थियों की इस मांग पर क्या कदम उठाते हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है-अगर विश्वविद्यालय भोजपुरी में पढ़ा और शोध करा सकते हैं, तो भोजपुरी के विद्यार्थियों को NET में अपना विषय चुनने का अधिकार कब मिलेगा?





ठीक लिखा बा। भोजपुरी 24 के धन्यवाद, आभार!