गोरखपुर/लखनऊ। भोजपुरी भाषा, लोककला और लोकसंस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन में योगदान के लिए गोरखपुर के लोकगायक एवं लोक कला साधक डॉ. राकेश श्रीवास्तव को स्व. रवि नागर स्मृति मंजुश्री सम्मान से सम्मानित किया गया। सम्मान समारोह 30 सितंबर को लखनऊ स्थित अंतरराष्ट्रीय बौद्ध प्रतिष्ठान में आयोजित हुआ।
मंजुश्री संस्था की ओर से आयोजित समारोह में यह सम्मान डॉ. राकेश श्रीवास्तव को लोककला, पारंपरिक भोजपुरी लोकगीतों और लोक संस्कृति को नई पीढ़ी से जोड़ने के उनके लंबे प्रयासों के लिए प्रदान किया गया। संस्था के प्रमुख शैलेश श्रीवास्तव ने उनके योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि डॉ. राकेश श्रीवास्तव अपनी माता एवं प्रसिद्ध लोकगायिका स्व. मैनावती देवी की लोकगायन परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
ये भी पढ़ें-बिरहा-बगान : विलुप्त होत भोजपुरी बिरहा परंपरा के फेरु से स्वर देवे के एगो सार्थक कोशिश
भोजपुरी लोकगायन को नई पहचान
डॉ. राकेश श्रीवास्तव लंबे समय से भोजपुरी के पारंपरिक और श्लील लोकगायन के संरक्षण एवं प्रचार-प्रसार से जुड़े हैं। उन्होंने लोकगीतों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के साथ भारतीय लोक संस्कृति को देश और विदेश के मंचों पर प्रस्तुत किया है। वे भारत के अलावा अमेरिका और मॉरीशस सहित विभिन्न देशों में भोजपुरी लोकगीतों की प्रस्तुतियां दे चुके हैं। उनके सांस्कृतिक कार्यों के लिए उन्हें पहले उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी सम्मान से भी सम्मानित किया जा चुका है।
‘पिया परदेसिया’ का भी हुआ मंचन
सम्मान समारोह के दौरान विदेसिया शैली पर आधारित नाटक ‘पिया परदेसिया’ का मंचन भी किया गया। नाटक का लेखन आशुतोष मिश्रा ने किया था और इसका निर्देशन शैलेश श्रीवास्तव ने किया। समारोह में इसके दो शो आयोजित किए गए।
सम्मान प्राप्त करने के बाद डॉ. राकेश श्रीवास्तव ने मंजुश्री संस्था के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह सम्मान उनके लिए व्यक्तिगत उपलब्धि के साथ-साथ लोककला, भोजपुरी भाषा और मातृभाषा की सेवा के प्रति नई ऊर्जा और जिम्मेदारी का प्रतीक है।
ये भी पढ़ें- भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में मिले स्थान, तो बदल सकती है करोड़ों लोगों की तकदीर
समारोह में संगीतकार केवल कुमार, साहित्यकार अजय मिश्रा, गजल गायक मिथिलेश लखनवी, दूरदर्शन की कार्यक्रम अधिकारी नलिनी श्रीवास्तव सहित कला और साहित्य जगत से जुड़े लोग मौजूद रहे। डॉ. राकेश श्रीवास्तव का यह सम्मान भोजपुरी लोकसंगीत और लोकसंस्कृति के क्षेत्र में उनके लंबे सांस्कृतिक योगदान की एक नई पहचान के रूप में सामने आया है।




