गजेंद्र सिंह शेखावत ने भोजपुरी की वैश्विक पहचान का किया जिक्र, आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग फिर चर्चा में
नई दिल्ली/जोधपुर: भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता देने की मांग के बीच केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के बयान से इस मुद्दे पर नई चर्चा शुरू हो गई है। राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता देने के सवाल पर बातचीत के दौरान शेखावत ने भोजपुरी का भी उल्लेख किया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, शेखावत ने राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए लंबे समय से प्रयास किए जाने की बात कही। उन्होंने यह भी बताया कि विभिन्न भाषाओं को मान्यता देने से जुड़े 32 से अधिक प्रस्ताव लंबित हैं और गृह मंत्रालय इस दिशा में काम कर रहा है। हालांकि, भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के संबंध में किसी अंतिम निर्णय की घोषणा नहीं हुई है।
आठवीं अनुसूची में शामिल करने की लंबे समय से मांग
भोजपुरी भाषी समाज लंबे समय से भोजपुरी को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग कर रहा है। वर्तमान में संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएं शामिल हैं, लेकिन भोजपुरी को अब तक इसमें स्थान नहीं मिला है।
भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता मिलने से भाषा के संरक्षण, शिक्षा, साहित्य, सांस्कृतिक गतिविधियों और संस्थागत विकास के नए अवसर खुल सकते हैं। मांग के समर्थकों का कहना है कि भोजपुरी के व्यापक जनाधार, समृद्ध साहित्यिक परंपरा और अंतरराष्ट्रीय पहचान को देखते हुए सरकार को इस विषय पर ठोस पहल करनी चाहिए।
गिरमिटिया भारतीयों के इतिहास से जुड़ी है भोजपुरी की वैश्विक पहचान
भोजपुरी केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक पहचान और समृद्ध लोकपरंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत से मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद और टोबैगो सहित कई देशों में पहुंचे भारतीय समुदायों ने भोजपुरी भाषा, लोकगीत, साहित्य और परंपराओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखा है।
गिरमिटिया भारतीयों के संघर्ष और प्रवास के इतिहास में भोजपुरी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। विदेशों में भोजपुरी की सांस्कृतिक उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि यह भाषा भारत की सीमाओं से बाहर भी अपनी पहचान बनाए हुए है।
बयान से बढ़ी उम्मीद, लेकिन फैसले का इंतजार
शेखावत के बयान में भोजपुरी का उल्लेख इस भाषा की वैश्विक पहचान को रेखांकित करता है। हालांकि, इसे भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की सरकारी घोषणा या अंतिम निर्णय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
अब भोजपुरी भाषी समाज की निगाह इस बात पर है कि केंद्र सरकार संवैधानिक मान्यता की मांग पर आगे क्या कदम उठाती है। भोजपुरी भाषियों को उम्मीद है कि भाषा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और करोड़ों लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए इस दिशा में ठोस पहल की जाएगी।
भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता दिलाने की मांग केवल भाषा का सवाल नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक पहचान और विरासत के सम्मान से भी जुड़ी है।




