डॉ. संतोष पटेल
एक साक्षात्कार में अरुण कमल ने भाषा आंदोलन, विशेषकर भोजपुरी मान्यता आंदोलन को लेकर कई बातें कहीं। साक्षात्कार करने वाले ऋषि भूषण के सवालों का जवाब सुनने लायक था।
मेरा मानना है कि अरुण कमल जैसे वरिष्ठ कवि और चिंतक द्वारा जनगणना के भाषा सर्वेक्षण को लेकर दिए गए सुझावों तथा भाषा आंदोलन पर व्यक्त विचारों के पीछे एक विशिष्ट भाषा-राजनीतिक दृष्टिकोण है। हालांकि, जब इन तर्कों की व्यावहारिक, सामाजिक और ऐतिहासिक धरातल पर समीक्षा की जाती है, तो कई गंभीर अंतर्विरोध और कमजोरियां सतह पर आ जाती हैं।
नीचे इन सभी बिंदुओं की क्रमवार और तार्किक समीक्षा प्रस्तुत है।
1. क्या हिंदी इतनी कमजोर है कि उसे ‘कृत्रिम आंकड़ों’ के सहारे की जरूरत पड़े?
अरुण कमल का यह सुझाव—कि लोग जनगणना में अपनी मातृभाषा के नाम के आगे ‘हिंदी’ (जैसे भोजपुरी हिंदी, मैथिली हिंदी आदि) दर्ज कराएं—मूल रूप से हिंदी के जनसांख्यिकीय आकार को बड़ा दिखाने का एक प्रयास है। परंतु सवाल उठता है कि क्या पिछले 80-100 वर्षों के इतिहास में हिंदी इतनी कमजोर हुई है कि उसे अस्तित्व में रहने के लिए इस प्रकार के कृत्रिम सहारे की आवश्यकता पड़े?
वास्तविकता यह है कि आजादी के बाद से हिंदी का प्रसार, प्रभाव और सामर्थ्य निरंतर बढ़ा है। आज हिंदी भारत की सबसे बड़ी संपर्क भाषा है, जो व्यापार, मनोरंजन, डिजिटल मीडिया, सिनेमा और जन-संचार के माध्यम से देश के कोने-कोने तक पहुंची है। किसी भाषा की ताकत इस बात से तय नहीं होती कि कागजों पर उसकी उप-बोलियों को किस तरह नामांकित किया गया है, बल्कि इस बात से होती है कि उसका व्यावहारिक प्रयोग कितना समृद्ध है।
ये भी पढ़ें- भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में मिले स्थान, तो बदल सकती है करोड़ों लोगों की तकदीर
भोजपुरी, मगही, मैथिली या बज्जिका बोलने वालों को उनकी विशिष्ट भाषाई पहचान से वंचित करके हिंदी को ‘संख्यात्मक रूप से मजबूत’ दिखाने की सोच हिंदी की वास्तविक शक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि एक अवास्तविक असुरक्षा बोध है।
2. ‘सबने मातृभाषा लिखवाया तो हिंदी खत्म हो जाएगी’-एक काल्पनिक डर
यह तर्क पूरी तरह काल्पनिक और आधारहीन है कि यदि लोग अपनी वास्तविक मातृभाषा (भोजपुरी, मगही, अंगिका आदि) लिखवाएंगे तो हिंदी का अस्तित्व खत्म हो जाएगा।
भारत एक बहुभाषी समाज है। यहां व्यक्ति की एक ‘मातृभाषा’ (Mother Tongue) हो सकती है और साथ ही एक ‘द्वितीयक’ या ‘संपर्क भाषा’ (Link Language) भी हो सकती है। कोई व्यक्ति भोजपुरी या मैथिली को अपनी मातृभाषा मानते हुए भी हिंदी का उपयोग, पठन-पाठन और सृजन कर सकता है।
मैथिली को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल किए जाने के बाद भी क्या मैथिली भाषी क्षेत्रों से हिंदी गायब हो गई? बिल्कुल नहीं। क्षेत्रीय भाषाओं या बोलियों के सशक्त होने से हिंदी का आधार व्यापक ही होता है, कमजोर नहीं। अतः यह डर फैलाना कि मातृभाषा दर्ज कराने से हिंदी का अस्तित्व मिट जाएगा, केवल भाषा-राजनीति का एक काल्पनिक आख्यान है।
ये भी पढ़ें- विश्व मंच पर बुलंद भोजपुरी, संविधान में अब भी क्यों नहीं मिली जगह?
3. अंग्रेजी के हावी होने और राजकाज की भाषा बनने का कमजोर तर्क
भाषा आंदोलन को कमजोर करने के लिए यह तर्क बार-बार दिया जाता है कि यदि हिंदी भाषी क्षेत्र की बोलियां/भाषाएं अलग पहचान मांगेंगी, तो जनगणना में हिंदी भाषी लोगों का प्रतिशत घट जाएगा। इसके परिणामस्वरूप अंग्रेजी को बढ़त मिलेगी और वह देश की एकमात्र राजकाज की भाषा बन जाएगी।
यह तर्क पूरी तरह से भ्रामक है।
नीतिगत सच्चाई: भारत की राजभाषा और प्रशासनिक भाषा नीतियों का निर्धारण संविधान के प्रावधानों और व्यावहारिक आवश्यकताओं से होता है, केवल जनगणना के प्रतिशत आंकड़ों से नहीं।
ये भी पढ़ें-सांविधानिक दर्जा की आस में भोजपुरी, छह दशक से सिर्फ आंदोलन और इंतजार
अंग्रेजी की प्रकृति: अंग्रेजी का प्रसार किसी क्षेत्रीय भाषा के आने या जाने से नहीं, बल्कि वैश्वीकरण, रोजगार के अवसरों और शिक्षा नीति के कारण है।
असंगत भय: भोजपुरी या मगही बोलने वाला व्यक्ति कभी अंग्रेजी के कारण अपनी भाषा नहीं छोड़ता; बल्कि हिंदी और उसकी सह-भाषाएं एक-दूसरे की पूरक हैं। भाषा आंदोलनों को दबाने के लिए ‘अंग्रेजी के डर’ का इस्तेमाल करना केवल वास्तविक भाषाई अधिकारों और जन-आकांक्षाओं से ध्यान भटकाने का प्रयास है।
4. पाठ्यक्रम में जगह नहीं और विश्वविद्यालय का सपना?
भोजपुरी विश्वविद्यालय की स्थापना के दावों या योजनाओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है। जो विचारक या संगठन दशकों तक भोजपुरी को प्राथमिक या उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल कराने के लिए ठोस धरातल पर काम नहीं कर सके, उनके द्वारा सीधे ‘विश्वविद्यालय’ बनाने का दावा करना एक व्यावहारिक अंतर्विरोध लगता है।
ये भी पढ़ें- भोजपुरी के शब्द बोलकर वोट लेने वाले क्यों नहीं लड़ते भोजपुरी की लड़ाई ?
जब तक किसी भाषा को:
- स्कूली स्तर पर शिक्षा का माध्यम या विषय नहीं बनाया जाता।
- नई शिक्षा नीति, 2020 के नियमों को इस बाबत लागू नहीं किया जाता।
- उसे प्राथमिक स्तर से इंप्लीमेंट नहीं किया जाता।
- उसकी पाठ्यपुस्तकों का व्यापक निर्माण नहीं होता।
- उसमें विस्तार नहीं होता और उसके विषयों पर शोध नहीं होता।
- उसे संवैधानिक मान्यता के साथ संस्थागत समर्थन नहीं मिलता।
तब तक केवल विश्वविद्यालय की बात करना एक राजनीतिक या बौद्धिक जुमला प्रतीत होता है। जमीनी भाषाई विकास के बिना ऐसी बड़ी घोषणाएं केवल वादे बनकर रह जाती हैं।
5. जनवादी रचनाकारों का जनभाषा के विरोध में अंतर्विरोध
सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह है कि खुद को ‘जनवादी’ या ‘वामपंथी’ कहने वाले प्रगतिशील साहित्यकार और विचारक भोजपुरी, मैथिली जैसी लोकभाषाओं (जनभाषाओं) के अधिकारिक आंदोलनों का विरोध क्यों करते हैं?
जनवाद का मूल सिद्धांत कहता है कि ‘जनता की भाषा ही साहित्य और अभिव्यक्ति की वास्तविक भाषा है।’ जब करोड़ों आम लोग (किसान, मजदूर, आम नागरिक) भोजपुरी में सोचते हैं, बोलते हैं और अपनी भावनाएं व्यक्त करते हैं, तो उस भाषा को 8वीं अनुसूची में शामिल करने या उसे उसका वाजिब अधिकार देने का विरोध करना सीधे तौर पर जनवादी सिद्धांतों के विपरीत है।
यदि कोई रचनाकार जनता की भाषा को केवल ‘हिंदी की बोली’ बताकर उसकी स्वतंत्र पहचान और विकास को रोकना चाहता है, तो यह ‘केंद्रीयतावादी’ (Centralist) दृष्टिकोण है, जनवादी नहीं। लोकभाषाओं का दमन करके किसी एक मानक भाषा का वर्चस्व कायम करने की सोच किसी भी मायने में प्रगतिशील नहीं कही जा सकती।
निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि हिंदी कोई कांच का बर्तन नहीं है जो भोजपुरी या अन्य मातृभाषाओं को उनका अधिकार देने से टूट जाएगा। हिंदी की ताकत उसकी समावेशी प्रकृति में है। लोकभाषाओं के आंदोलन को कमजोर करने के लिए अंग्रेजी का भय दिखाना, अस्तित्व के संकट का तर्क देना और प्रशासनिक स्तर पर अव्यावहारिक वादे करना केवल भाषा-राजनीति का हिस्सा है।




