वाराणसी। भोजपुरी लोकसंगीत का करीब 200 साल पुराना गीत ‘कचौड़ी गली’ इन दिनों एक बार फिर चर्चा में है। कोक स्टूडियो भारत के नए संस्करण में रेखा भारद्वाज और लोकगायक उत्पल उदित की आवाज में सामने आए इस गीत ने सोशल मीडिया पर लोगों का ध्यान खींचा है। पहली नजर में सामान्य लोकगीत लगने वाला यह गीत दरअसल प्रेम, विरह, पलायन और उस दौर की सामाजिक पीड़ा की कहानी अपने भीतर समेटे हुए है।
गीत की चर्चित पंक्ति ‘सेजिया पे लोटे काला नाग हो, कचौड़ी गली सून कैले बलमु’ एक ऐसी महिला की तड़प को सामने लाती है, जिसका प्रिय उससे दूर चला गया है। लोककथाओं और अलग-अलग रिपोर्टों में इस गीत को बनारस की एक तवायफ गौहर जान की अधूरी प्रेम कहानी से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि दालमंडी में रहने वाली गौहर जान की नजर कचौड़ी गली में असलम नाम के युवक पर पड़ी थी। दोनों के बीच बातचीत नहीं हुई, लेकिन गौहर उसके प्रति आकर्षित हो गईं। बाद में असलम मिर्जापुर चला गया और फिर उसके रंगून भेजे जाने की खबर मिली। इसी जुदाई का दर्द गीत में दिखाई देता है।
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रंगून से जुड़ा है पलायन का दर्द
‘कचौड़ी गली’ की कहानी को केवल प्रेम-विरह तक सीमित नहीं माना जाता। कुछ लोक-स्रोत इसे 19वीं सदी के दौरान पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार से लोगों के बड़े पैमाने पर पलायन और अंग्रेजी शासन के दौर में रंगून भेजे जाने की घटनाओं से भी जोड़ते हैं। पहली एंग्लो-बर्मी युद्ध (1824-1826) के दौर से जुड़ी ऐसी लोक-स्मृतियों में घर से दूर गए पुरुषों और पीछे छूट गई महिलाओं के दर्द की झलक मिलती है।
इसी वजह से इस गीत को कुछ स्रोत ‘गिरमिटिया गीत’ की परंपरा से भी जोड़ते हैं। ऐसे गीतों में अपने घर-परिवार और देश से दूर चले गए लोगों की पीड़ा और बिछड़ने की कसक अभिव्यक्त होती थी। हालांकि ‘कचौड़ी गली’ की उत्पत्ति और इससे जुड़ी प्रेमकथा के बारे में अलग-अलग लोककथाएं और मत मिलते हैं, इसलिए इन्हें ऐतिहासिक तथ्य के बजाय लोकपरंपरा के रूप में देखना अधिक उचित है।
रसूलन बाई से रेखा भारद्वाज तक
समय के साथ यह लोकधुन बनारस की संगीत और तवायफ संस्कृति का हिस्सा बनी। रसूलन बाई समेत कई प्रसिद्ध गायिकाओं ने इसे अपनी गायकी के जरिए आगे बढ़ाया। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान भी इस धुन को अपने कार्यक्रमों में प्रस्तुत करते थे। बाद में मालिनी अवस्थी समेत कई कलाकारों ने इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाया।
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अब रेखा भारद्वाज और उत्पल उदित ने इसे कोक स्टूडियो भारत के मंच पर नए संगीत संयोजन के साथ पेश किया है। इससे भोजपुरी की पुरानी लोकधुन को देशभर में नई पहचान मिल रही है। गीत का नाम जिस कचौड़ी गली से जुड़ा है, वह वाराणसी में आज भी मौजूद है।
भोजपुरी24 के लिए खास बात: यह गीत सिर्फ एक अधूरी मोहब्बत की कहानी नहीं, बल्कि भोजपुरी लोकस्मृति में दर्ज विरह, पलायन और बिछड़ने के सामूहिक दर्द को समझने का एक रास्ता भी है।




