अस्सी घाट पर गूंजी भोजपुरी की मिठास, काव्य गंगा में झलकी गंवई संस्कृति

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वाराणसी। सुबह-ए-बनारस की ओर से मंगलवार को अस्सी घाट पर आयोजित ‘काव्य गंगा’ पूरी तरह भोजपुरी संस्कृति को समर्पित रही। इस खास सत्र में काशी और मिर्जापुर के रचनाकारों ने अपनी कविताओं के जरिए गांव की मिट्टी, परंपरा और भावनाओं के जीवंत शब्दचित्र प्रस्तुत किए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता भोजपुरी रचनाकार मंगल मुंशी के पुत्र डॉ. ओमप्रकाश श्रीवास्तव ‘प्रकाश मिर्जापुरी’ ने की। उन्होंने लक्ष्मण शक्ति प्रसंग को अपनी रचना में समेटते हुए भावपूर्ण प्रस्तुति दी-

परी मोरी नइया मंझधार भइया लछिमन,
देखा तनी अंखिया उबार भइया लछिमन।

इसके साथ ही उन्होंने गांव के सिवान से लेकर देश की सीमा तक के विस्तार को भी अपनी रचना में उकेरा।
वरिष्ठ रचनाकार अनामिका पाठक ने अपनी रचनाओं में प्रतीक्षा की पीड़ा और बेटी की विदाई की मार्मिक अनुभूति को सजीव किया। वहीं, रचनाकार ऋतु दीक्षित ने मन की व्यथा और शिवभक्ति को अपने काव्य में खूबसूरती से पिरोया। मुनिजी तिवारी ने गांव लौटने का संदेश देते हुए श्रोताओं को भावुक कर दिया-

मितवा चला चली अपने गांव हो,
जहां खुला मिली आसमान हो…

कार्यक्रम का संचालन आकाशवाणी की वरिष्ठ उद्घोषिका जाददेश्री चौबे ने किया, जबकि स्वागत अरविंद मिश्र ‘हर्ष’ ने किया। इस अवसर पर राजलक्ष्मी मिश्र ‘मन’, वीना त्रिपाठी, सूर्यकांत त्रिपाठी, पं. सूर्यप्रकाश मिश्र, गिरीश पांडेय ‘काशिकेय’, डॉ. महेंद्र तिवारी ‘अलंकार’, प्रो. वत्सला श्रीवास्तव, डॉ. प्रतापशंकर दूबे, अनु मिश्र, जया टंडन, विजयचंद्र त्रिपाठी, विजय उपाध्याय, अब्दुल्ला खान ‘भारतीय’, परमसंह तिवारी आनंदकृष्ण ‘मासूम’, डॉ. नागेश शांडिल्य, एड. रुद्रनाथ त्रिपाठी ‘पुंड’ सहित कई साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।

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