जयंती विशेष | 24 अक्टूबर 1941 – 23 अप्रैल 2021
भोजपुरी भाषा की समृद्ध विरासत, साहित्यिक परंपरा और सांस्कृतिक पहचान को स्थापित करने में प्रो. (डॉ.) अर्जुन तिवारी का योगदान अविस्मरणीय है। वे केवल शिक्षक और लेखक ही नहीं, बल्कि भोजपुरी भाषा के गंभीर अध्येता, कोशकार, साहित्येतिहासकार और पत्रकारिता के विद्वान भी थे। उन्होंने अपना जीवन भोजपुरी भाषा के अध्ययन, संरक्षण और विकास के लिए समर्पित कर दिया। उनकी जयंती पर उन्हें याद करना भोजपुरी की ज्ञान-परंपरा और साहित्यिक विरासत को सम्मान देने जैसा है।
गांव की मिट्टी से अकादमिक जगत तक का सफर
प्रो. (डॉ.) अर्जुन तिवारी का जन्म 24 अक्टूबर 1941 को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के भाटपार-रानी में हुआ था। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े तिवारी के व्यक्तित्व में लोकजीवन की सहजता, अध्ययन के प्रति लगन और ज्ञान के प्रति गहरी प्रतिबद्धता दिखाई देती थी। आध्यात्मिक क्षेत्र में देवरहा बाबा के सानिध्य से उनका जुड़ाव भी उनके जीवन के उल्लेखनीय पहलुओं में शामिल रहा।
उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने लगभग 34 वर्षों तक भाटपार-रानी डिग्री कॉलेज में अध्यापन किया। इस दौरान उन्होंने अनेक विद्यार्थियों को शिक्षा और ज्ञान से जोड़ा। बाद में वे महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यक्ष बने और वहीं से सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद भी उनका अकादमिक योगदान जारी रहा और वे नालंदा खुला विश्वविद्यालय, बिहार से भी जुड़े रहे।
भोजपुरी भाषा को शब्दकोश और शोध का आधार दिया
डॉ. अर्जुन तिवारी का महत्वपूर्ण योगदान भोजपुरी की शब्द-संपदा को व्यवस्थित रूप से संकलित करने और उसके साहित्यिक इतिहास को सामने लाने में रहा। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘भोजपुरी-हिन्दी-अंग्रेजी त्रिभाषी शब्दकोश’ और ‘भोजपुरी हिन्दी शब्दकोष’ शामिल हैं। इन पुस्तकों के माध्यम से भोजपुरी शब्दों को संकलित करने, उनके अर्थ स्पष्ट करने और भाषा के अध्ययन के लिए संदर्भ सामग्री उपलब्ध कराने का महत्वपूर्ण प्रयास हुआ।
किसी भाषा की समृद्धि केवल उसके बोलने वालों की संख्या से नहीं मापी जाती। उसका व्याकरण, शब्दकोश, साहित्य, इतिहास और शोध-सामग्री भी उसकी प्रतिष्ठा के महत्वपूर्ण आधार होते हैं। डॉ. तिवारी ने भोजपुरी के लिए इसी बौद्धिक आधार को मजबूत करने का प्रयास किया। उनका काम विद्यार्थियों, शोधार्थियों और भाषा के अध्येताओं के लिए उपयोगी साबित हुआ।
भोजपुरी साहित्य के इतिहास को दर्ज करने का प्रयास
‘भोजपुरी साहित्य के इतिहास’ और ‘समकालीन भोजपुरी साहित्य के समीक्षात्मक अध्ययन’ जैसी कृतियों के माध्यम से डॉ. तिवारी ने भोजपुरी साहित्य की परंपरा, विकास और समकालीन रचनात्मकता के अध्ययन में योगदान दिया।
भोजपुरी साहित्य में लोकगीत, लोककथाएं, सामाजिक अनुभव, संघर्ष और जनजीवन की विविध अभिव्यक्तियां मौजूद हैं। इन रचनात्मक परंपराओं का अध्ययन और दस्तावेजीकरण किसी भी भाषा की साहित्यिक पहचान को मजबूत करता है। डॉ. तिवारी का लेखन इसी दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखा जाता है।
उनकी पुस्तक ‘आजादी के लड़ाई आ जुझारू भोजपुरिया’ स्वतंत्रता आंदोलन में भोजपुरी क्षेत्र के लोगों के संघर्ष और योगदान को सामने लाने का प्रयास करती है। इस तरह का लेखन क्षेत्रीय इतिहास को व्यापक राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य से जोड़ने में मदद करता है।
हिंदी पत्रकारिता और जनसंचार के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान
डॉ. अर्जुन तिवारी की विद्वता भोजपुरी साहित्य तक सीमित नहीं थी। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता, जनसंचार, विज्ञापन और जनसंपर्क के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण लेखन किया। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘स्वतंत्रता आन्दोलन और हिन्दी पत्रकारिता’, ‘आधुनिक पत्रकारिता’, ‘जनसंचार और हिन्दी पत्रकारिता’, ‘हिन्दी पत्रकारिता का वृहद इतिहास’, ‘इतिहास निर्माता पत्रकार’, ‘आधुनिक विज्ञापन’, ‘पराड़कर जी – एक जीवनी’, ‘मीडिया समग्र’ और ‘जनसम्पर्क सिद्धांत एवं व्यवहार’ शामिल हैं।
इन पुस्तकों के माध्यम से पत्रकारिता के इतिहास, सिद्धांत और व्यवहार को समझने के लिए महत्वपूर्ण अध्ययन सामग्री उपलब्ध हुई। पत्रकारिता के अध्यापन और शोध से जुड़े लोगों के लिए उनका लेखन उपयोगी संदर्भ प्रदान करता है।
उनकी अन्य कृतियों में ‘हिन्दी व्याकरण और रचना’, ‘सम्पूर्ण पत्रकारिता’, ‘सद्भाव सेतु शंकर’ और ‘माटी के लाल के नमन’ का भी उल्लेख मिलता है। उनकी रचनाओं का व्यापक दायरा भाषा, साहित्य, इतिहास और मीडिया के बीच उनके गहरे संबंध को दर्शाता है।
भोजपुरी की पहचान के लिए ज्ञान-साधना का महत्व
आज भोजपुरी भाषा को शिक्षा, साहित्य, डिजिटल माध्यम और वैश्विक मंचों पर अधिक पहचान दिलाने के प्रयास जारी हैं। भोजपुरी की संवैधानिक मान्यता का प्रश्न भी लंबे समय से सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा रहा है। ऐसे समय में डॉ. अर्जुन तिवारी जैसे विद्वानों का काम भाषा के व्यवस्थित अध्ययन और दस्तावेजीकरण की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
भाषा के विकास के लिए जनभावना के साथ-साथ शोध, शब्दकोश निर्माण, साहित्यिक इतिहास का लेखन और नई पीढ़ी तक ज्ञान पहुंचाना भी जरूरी है। डॉ. तिवारी ने अपने लेखन और अकादमिक जीवन के माध्यम से इन क्षेत्रों में योगदान दिया।
23 अप्रैल 2021 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनके द्वारा छोड़ी गई साहित्यिक और अकादमिक विरासत आज भी महत्वपूर्ण है। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि मातृभाषा की सेवा केवल भावनात्मक जुड़ाव तक सीमित नहीं होती, बल्कि निरंतर अध्ययन, लेखन और ज्ञान-सृजन से भी होती है।
प्रो. (डॉ.) अर्जुन तिवारी की जयंती पर उन्हें नमन करना भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रति उनके समर्पण को याद करना है। शब्दकोश निर्माण से लेकर साहित्यिक इतिहास और हिंदी पत्रकारिता तक फैला उनका कार्य उन्हें भोजपुरी के प्रमुख विद्वानों में विशिष्ट स्थान दिलाता है।




